Class 10 Hindi Ch 10 – Ek Kahani Yeh Bhi | All Questions
NCERT CLASS 10 HINDI • KSHITIJ CHAPTER 10 • EK KAHANI YEH BHI • COMPLETE SOLUTIONS

एक कहानी यह भी

लेखिका: मन्नू भंडारी (Mannu Bhandari)

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
प्रश्न 1
लेखिका के व्यक्तित्व पर किन-किन व्यक्तियों का किस रूप में प्रभाव पड़ा?
लेखिका के व्यक्तित्व पर मुख्य रूप से दो व्यक्तियों का गहरा प्रभाव पड़ा:
  • पिताजी का प्रभाव: पिताजी ने लेखिका को हीनभावना से उबारा और आत्मविश्वास दिया। उन्होंने लेखिका को रसोई तक सीमित न रखकर देश-दुनिया की जानकारी रखने और राजनीतिक बहसों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। हालाँकि, उनके क्रोधी और शक्की स्वभाव ने भी लेखिका को प्रभावित किया।
  • प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का प्रभाव: शीला अग्रवाल ने लेखिका का परिचय अच्छे साहित्य से करवाया और उन्हें देश की आजादी के आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने लेखिका के अंदर छिपे विद्रोह और उत्साह को जगाया।
प्रश्न 2
इस आत्मकथ्य में लेखिका के पिता ने रसोई को ‘भटियारखाना’ कहकर क्यों संबोधित किया है?
लेखिका के पिता का मानना था कि रसोई में काम करने से लड़कियों की प्रतिभा और क्षमता नष्ट हो जाती है। वे रसोई को केवल पेट भरने का साधन मानते थे जहाँ समय और ऊर्जा बर्बाद होती है। इसलिए उन्होंने रसोई को ‘भटियारखाना’ (जहाँ भट्ठी जलती है) कहकर संबोधित किया, क्योंकि वे चाहते थे कि उनकी बेटी देश और समाज के मुद्दों पर ध्यान दे।
प्रश्न 3
वह कौन-सी घटना थी जिसके बारे में सुनने पर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हो पाया और न अपने कानों पर?
एक बार कॉलेज से प्रिंसिपल का पत्र आया कि लेखिका की गतिविधियों (हड़ताल, नारेबाजी) के कारण उन्हें कॉलेज से क्यों न निकाल दिया जाए। पिताजी गुस्से में कॉलेज गए थे। लेकिन जब वे लौटे, तो उनका चेहरा गर्व से चमक रहा था। उन्होंने बताया कि कॉलेज की सारी लड़कियाँ लेखिका के एक इशारे पर क्लास छोड़कर बाहर आ जाती हैं और कॉलेज का पूरा प्रशासन हिल गया है। यह सुनकर लेखिका को विश्वास ही नहीं हुआ कि जिस बात पर पिता को गुस्सा होना चाहिए था, उस पर वे गर्व महसूस कर रहे थे।
प्रश्न 4
लेखिका की अपने पिता से वैचारिक टकराहट को अपने शब्दों में लिखिए।
लेखिका और उनके पिता के विचारों में गहरा मतभेद था।
  • पिताजी चाहते थे कि लेखिका घर में रहकर ही देश-दुनिया की जानकारी ले, जबकि लेखिका सक्रिय रूप से आंदोलनों में भाग लेना चाहती थीं।
  • पिताजी समाज में अपनी प्रतिष्ठा और मर्यादा को लेकर चिंतित रहते थे, जबकि लेखिका खुल्लम-खुल्ला विद्रोह और नारेबाजी करती थीं।
  • पिताजी लड़कियों की आजादी एक सीमा तक ही चाहते थे, जबकि लेखिका उस सीमा को तोड़कर अपनी पहचान बनाना चाहती थीं।
प्रश्न 5
इस आत्मकथ्य के आधार पर स्वाधीनता आंदोलन के परिदृश्य का चित्रण करते हुए उसमें मन्नू जी की भूमिका को रेखांकित कीजिए।
सन् 1946-47 के समय स्वाधीनता आंदोलन अपने चरम पर था। पूरा देश ‘भारत छोड़ो’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारों से गूँज रहा था। स्कूल-कॉलेज बंद थे और छात्र-छात्राएं सड़कों पर रैलियां निकाल रहे थे। इस माहौल में मन्नू जी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने प्रभात फेरियां निकालीं, हड़तालें करवाईं और ओजस्वी भाषण दिए। उनकी नेतृत्व क्षमता इतनी प्रबल थी कि कॉलेज प्रशासन को भी झुकना पड़ा। उन्होंने युवा शक्ति को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई।
रचना और अभिव्यक्ति
प्रश्न 6
लेखिका ने बचपन में भाइयों के साथ गिल्ली डंडा आदि खेले। क्या आज भी लड़कियों के लिए स्थितियाँ ऐसी ही हैं?
लेखिका के समय लड़कियों की आजादी घर की चारदीवारी तक ही सीमित थी। आज समय काफी बदल गया है। लड़कियाँ अब केवल घर के खेल नहीं खेलतीं, बल्कि क्रिकेट, बैडमिंटन, मुक्केबाजी जैसे खेलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रही हैं। वे शिक्षा, नौकरी और सेना हर क्षेत्र में लड़कों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं। हालाँकि, सुरक्षा की दृष्टि से कुछ चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं।
प्रश्न 7
मनुष्य के जीवन में आस-पड़ोस का बहुत महत्त्व होता है। परंतु महानगरों में रहने वाले लोग प्रायः ‘पड़ोस कल्चर’ से वंचित रह जाते हैं। विचार लिखिए।
‘पड़ोस कल्चर’ सामाजिक सुरक्षा और अपनत्व का प्रतीक है। गाँवों और छोटे शहरों में आज भी लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं। लेकिन महानगरों की भागदौड़ भरी जिंदगी और फ्लैट संस्कृति ने लोगों को एकाकी बना दिया है। लोग अपने पड़ोसी तक को नहीं पहचानते। इससे असुरक्षा और अकेलेपन की भावना बढ़ती है। सामाजिक सहयोग की भावना धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है।
भाषा-अध्ययन
प्रश्न 10
रेखांकित मुहावरों का प्रयोग कर वाक्य बनाइए: (क) लू उतारना (ख) आग लगाना (ग) थू-थू करना (घ) आग-बबूला होना।
  • लू उतारना (अहंकार तोड़ना/खरी-खोटी सुनाना): शिक्षक ने नकल करते पकड़े जाने पर छात्र की भरी कक्षा में अच्छी तरह लू उतारी
  • आग लगाना (झगड़ा कराना): मंथरा ने कैकेयी के कान भरकर पूरे अयोध्या में आग लगा दी
  • थू-थू करना (निंदा करना/बदनामी होना): गलत काम करने वालों पर समाज थू-थू करता है।
  • आग-बबूला होना (बहुत गुस्सा होना): गृहकार्य पूरा न होने पर पिताजी आग-बबूला हो गए
पाठेतर सक्रियता
प्रश्न 1
स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी पर एक प्रोजेक्ट तैयार करें।
प्रोजेक्ट: सरोजिनी नायडू – भारत कोकिला
सरोजिनी नायडू न केवल एक महान कवयित्री थीं, बल्कि एक निडर स्वतंत्रता सेनानी भी थीं। उन्होंने गांधीजी के साथ दांडी मार्च और नमक सत्याग्रह में भाग लिया। उन्होंने महिलाओं को घर से बाहर निकलकर आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। वे आजाद भारत में उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल बनीं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि कलम और कर्म दोनों से देश की सेवा की जा सकती है।
लघु एवं अति लघु उत्तरीय प्रश्न
Q1
लेखिका के पिता अजमेर क्यों आए थे?
इंदौर में एक बड़े आर्थिक झटके और घाटे के कारण उन्हें अजमेर आना पड़ा।
Q2
लेखिका में हीनभावना क्यों पैदा हुई?
लेखिका बचपन में काली और दुबली थी, जबकि उनकी बड़ी बहन सुशीला गोरी और स्वस्थ थी। पिता जी हमेशा सुशीला की प्रशंसा करते थे, जिससे लेखिका में हीनभावना आ गई।
Q3
शीला अग्रवाल कौन थीं?
शीला अग्रवाल सावित्री गर्ल्स कॉलेज में हिंदी की प्राध्यापिका थीं जिन्होंने लेखिका को साहित्य और राजनीति से जोड़ा।
Q4
15 अगस्त 1947 के दिन को लेखिका ने क्या कहा?
लेखिका ने इसे “शताब्दी की सबसे बड़ी उपलब्धि” कहा।
Q5
पिता का सबसे बड़ा गुण और अवगुण क्या था?
गुण उनकी शिक्षा के प्रति जागरूकता और दरियादिली थी, जबकि अवगुण उनका क्रोधी स्वभाव और शक्कीपन था।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
Q1
पिता के व्यक्तित्व के विरोधाभासों का वर्णन कीजिए।
लेखिका के पिता का व्यक्तित्व जटिल और विरोधाभासी था। एक तरफ वे आधुनिक विचारों के थे और लड़कियों की शिक्षा और जागरूकता के समर्थक थे। वे चाहते थे कि लड़कियाँ घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर देश की राजनीति को समझें। दूसरी तरफ, वे पुरानी मर्यादाओं और सामाजिक लोक-लाज से बंधे थे। वे चाहते थे कि लड़कियाँ विद्रोह तो करें, लेकिन एक सीमा के भीतर। उनका शक्की स्वभाव और आर्थिक तंगी ने उन्हें और अधिक क्रोधी बना दिया था।
Q2
लेखिका के बचपन के ‘पड़ोस-कल्चर’ और आज के शहरी जीवन में क्या अंतर है?
लेखिका के बचपन में ‘पड़ोस-कल्चर’ बहुत मजबूत था। पूरा मोहल्ला एक परिवार जैसा था। बच्चे किसी भी घर में बेरोकटोक आ-जा सकते थे और सभी बड़े-बुजुर्ग उन्हें अपने बच्चों जैसा मानते थे। दुख-सुख साझा होते थे। आज के शहरी जीवन, विशेषकर फ्लैट संस्कृति में, यह अपनापन खत्म हो गया है। लोग अपने पड़ोसी को भी नहीं जानते और केवल अपने तक सीमित रह गए हैं। इससे असुरक्षा और अलगाव की भावना बढ़ी है।
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