गज़ल (Ghazal)

एनसीईआरटी समाधान • कक्षा 11 हिंदी (आरोह) • दुष्यंत कुमार
गज़ल के साथ (Textbook Questions)
1. आखिरी शेर में ‘गुलमोहर’ की चर्चा हुई है। क्या उसका आशय एक खास तरह के फूलदार वृक्ष से है या उसमें कोई सांकेतिक अर्थ निहित है?
यहाँ ‘गुलमोहर’ का प्रयोग केवल फूलदार वृक्ष के अर्थ में नहीं, बल्कि एक गहरे सांकेतिक अर्थ में हुआ है।
प्रतीकात्मक अर्थ: ‘गुलमोहर’ यहाँ मानवीय मूल्यों, आत्म-सम्मान, स्वतंत्रता और देशप्रेम के जज्बे का प्रतीक है।
  • अपने बगीचे में गुलमोहर: का अर्थ है—अपने देश और समाज में रहते हुए अपने मानवीय मूल्यों और अधिकारों के साथ जीना।
  • गैर की गलियों में गुलमोहर: का अर्थ है—दूसरों के लिए या देश की खातिर शहीद होते समय भी उन मूल्यों की रक्षा करना।
2. पहले शेर में ‘चिरागाँ’ शब्द एक बार बहुवचन में आया है और दूसरी बार एकवचन (चिराग) में। इसका क्या महत्व है?
अर्थ:
  • चिरागाँ (बहुवचन): इसका अर्थ है ‘ढेर सारी रोशनियाँ’ या अत्यधिक सुख-सुविधाएँ। यह नेताओं द्वारा किए गए उन बड़े-बड़े वादों का प्रतीक है कि “पूरे शहर” को रोशन किया जाएगा।
  • चिराग (एकवचन): इसका अर्थ है ‘एक छोटा दिया’ या न्यूनतम आवश्यकता। यह आम आदमी की बुनियादी जरूरतों (रोटी, कपड़ा, मकान) का प्रतीक है।
काव्य-सौंदर्य: कवि ने विरोधाभास के माध्यम से व्यवस्था पर व्यंग्य किया है। सरकार ने वादा तो पूरे शहर को जगमगाने (चिरागाँ) का किया था, लेकिन हकीकत यह है कि एक घर के लिए एक दिया (चिराग) भी उपलब्ध नहीं है।
3. गज़ल के तीसरे शेर को गौर से पढ़ें। यहाँ दुष्यंत का इशारा किस तरह के लोगों की ओर है?
न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए
यहाँ कवि का इशारा भारत की शोषित, गरीब और संतोषी जनता की ओर है।
ये वे लोग हैं जो अपने अभावों का रोना नहीं रोते और न ही अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं। वे विपरीत परिस्थितियों में विरोध करने के बजाय उसी में समझौता कर लेते हैं (पाँवों से पेट ढँक लेते हैं)। ऐसे दबे-कुचले लोग भ्रष्ट शासकों के लिए बहुत ‘मुनासिब’ (उपयुक्त) होते हैं क्योंकि उनसे सत्ता को कोई खतरा नहीं होता।
4. आशय स्पष्ट करें:
तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की,
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए।
आशय: कवि सत्ता (शासक वर्ग) की तानाशाही प्रवृत्ति पर प्रहार कर रहा है।
  • जैसे गज़ल के छंद (बहर) को सही रखने के लिए शब्दों की सावधानी (एहतियात) ज़रूरी है, वैसे ही अपनी सत्ता (निज़ाम) को बचाए रखने के लिए शासक विद्रोह करने वाले शायरों/कवियों की आवाज़ को दबाना (जुबान सिलना) ज़रूरी समझते हैं।
  • कवि कहना चाहता है कि अगर शायर सच बोलेगा, तो सत्ता हिल जाएगी, इसलिए शासक सेंसरशिप (प्रतिबंध) लगाते हैं।
गज़ल के आस-पास (Around the Lesson)
1. “दुष्यंत की इस गज़ल का मिज़ाज बदलाव के पक्ष में है।” — विचार करें।
यह कथन पूर्णतः सत्य है। पूरी गज़ल में एक क्रांतिकारी स्वर गूँजता है।
  • कवि यथास्थिति (Status Quo) को स्वीकार नहीं करता। वह कहता है—”हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए।”
  • वह सिर्फ हंगामा खड़ा करना नहीं चाहता, बल्कि “सूरत बदलनी चाहिए।”
  • वह ‘बुनियाद’ (नींव) को हिलाने की बात करता है, जो बदलाव की तीव्र इच्छा को दर्शाता है।
2. ग़ालिब और दुष्यंत के शेर की तुलना:
ग़ालिब: “हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन / दिल के खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है”
दुष्यंत: “ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही / कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए”

समानता: दोनों शायर ‘परम सत्य’ (स्वर्ग/ईश्वर) पर संशय (Doubt) व्यक्त करते हैं।
  • दोनों का मानना है कि चाहे जन्नत/खुदा सच न हों, लेकिन यह कल्पना मनुष्य को मानसिक शांति और जीने का सहारा देती है।
  • दोनों ने धर्म/ईश्वर को ‘मन के बहलावे’ या ‘हसीन नज़ारे’ के रूप में देखा है।
शब्द-छवि (Vocabulary)
शब्द (Word)अर्थ (Meaning)
मयस्सरउपलब्ध (Available)
चिरागाँरोशनियाँ / अत्यधिक सुख (Lights/Luxury)
दरख्तपेड़ (Tree) – यहाँ संस्थाओं का प्रतीक
मुतमइनआश्वस्त / इत्मीनान से (Satisfied/Assured)
बेकरारबेचैन (Restless)
निज़ामशासन / राज (System/Rule)
एहतियातसावधानी (Precaution)
बहरछंद / लय (Meter in poetry)
गुलमोहरएक फूलदार पेड़ (प्रतीक: स्वाभिमान/आदर्श)
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