आओ मिलकर बचाएँ (Aao Milkar Bachayen)
एनसीईआरटी समाधान • कक्षा 11 हिंदी (आरोह) • निर्मला पुतुलकविता के साथ (Textbook Questions)
1. ‘माटी का रंग’ प्रयोग करते हुए किस बात की ओर संकेत किया गया है?
‘माटी का रंग’ का प्रयोग करके कवयित्री ने अपनी सांस्कृतिक पहचान और मूल अस्तित्व की ओर संकेत किया है।
वे चाहती हैं कि आदिवासी समाज शहरी संस्कृति की चकाचौंध में अपनी जड़ों से न कटे। उनका स्वभाव, व्यवहार और जीवनशैली वैसी ही बनी रहे जैसी उनकी मिट्टी (संथाल परगना) की है। वे अपनी स्थानीयता और देसीपन को बचाए रखना चाहती हैं।
वे चाहती हैं कि आदिवासी समाज शहरी संस्कृति की चकाचौंध में अपनी जड़ों से न कटे। उनका स्वभाव, व्यवहार और जीवनशैली वैसी ही बनी रहे जैसी उनकी मिट्टी (संथाल परगना) की है। वे अपनी स्थानीयता और देसीपन को बचाए रखना चाहती हैं।
2. भाषा में ‘झारखंडीपन’ से क्या अभिप्राय है?
भाषा में ‘झारखंडीपन’ का अभिप्राय झारखंड की स्थानीय बोली और भाषा के स्वाभाविक लहजे से है।
कवयित्री चाहती हैं कि लोग शहरी प्रभाव में आकर अपनी मातृभाषा को न भूलें। उनकी बोली में वही खड़ापन, जुझारूपन और मिठास बनी रहनी चाहिए जो झारखंड की क्षेत्रीय विशेषता है।
कवयित्री चाहती हैं कि लोग शहरी प्रभाव में आकर अपनी मातृभाषा को न भूलें। उनकी बोली में वही खड़ापन, जुझारूपन और मिठास बनी रहनी चाहिए जो झारखंड की क्षेत्रीय विशेषता है।
3. दिल के भोलेपन के साथ-साथ अक्खड़पन और जुझारूपन को भी बचाने की आवश्यकता पर क्यों बल दिया गया है?
- भोलापन: यह आदिवासियों का सहज स्वभाव है, जो उन्हें सच्चा और निष्कपट बनाता है।
- अक्खड़पन और जुझारूपन: ये गुण उन्हें शोषण के विरुद्ध खड़े होने और संघर्ष करने की शक्ति देते हैं।
4. प्रस्तुत कविता आदिवासी समाज की किन बुराइयों की ओर संकेत करती है?
यह कविता आदिवासी समाज में आ रही निम्नलिखित बुराइयों की ओर संकेत करती है:
- शराब की लत (हाड़िया): नशा समाज को खोखला कर रहा है।
- अशिक्षा और कुरीतियाँ: शिक्षा का अभाव।
- दिनचर्या में ठहराव (ठंडी दिनचर्या): उमंग और उत्साह की कमी।
- शहरी प्रभाव: अपनी संस्कृति को भूलकर शहरी दिखावे की ओर भागना।
5. “इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है” — से क्या आशय है?
कवयित्री आशावादी हैं। उनका मानना है कि भले ही शहरीकरण ने बहुत कुछ नष्ट कर दिया है, लेकिन सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।
अभी भी लोगों का आपसी विश्वास, उम्मीदें, सपने, प्रकृति (पहाड़, नदियाँ, हवा) और संस्कृति के मूल तत्व बचे हुए हैं। यदि हम अभी भी प्रयास करें, तो अपनी सभ्यता और पर्यावरण को बचा सकते हैं।
अभी भी लोगों का आपसी विश्वास, उम्मीदें, सपने, प्रकृति (पहाड़, नदियाँ, हवा) और संस्कृति के मूल तत्व बचे हुए हैं। यदि हम अभी भी प्रयास करें, तो अपनी सभ्यता और पर्यावरण को बचा सकते हैं।
6. काव्य सौंदर्य उद्घाटित कीजिए:
(क) ठंडी होती दिनचर्या में
जीवन की गर्माहट
जीवन की गर्माहट
भाव: आदिवासी जीवन में उत्साह की कमी (ठंडी दिनचर्या) आ रही है, जिसे फिर से जोश और उमंग (गर्माहट) से भरने की जरूरत है।
शिल्प: ‘ठंडी’ और ‘गर्माहट’ में विरोधाभास है। प्रतीकात्मकता का सुंदर प्रयोग है।
शिल्प: ‘ठंडी’ और ‘गर्माहट’ में विरोधाभास है। प्रतीकात्मकता का सुंदर प्रयोग है।
(ख) थोड़ा-सा विश्वास
थोड़ी-सी उम्मीद
थोड़े-से सपने
आओ, मिलकर बचाएँ।
थोड़ी-सी उम्मीद
थोड़े-से सपने
आओ, मिलकर बचाएँ।
भाव: जीवन जीने के लिए विश्वास, उम्मीद और सपनों का होना अनिवार्य है।
शिल्प: ‘थोड़ा-सा’, ‘थोड़ी-सी’, ‘थोड़े-से’ की आवृत्ति से लय उत्पन्न हुई है। भाषा अत्यंत सरल और आम बोलचाल की है (उर्दू शब्द ‘उम्मीद’ और तत्सम ‘विश्वास’ का मिला-जुला प्रयोग)।
शिल्प: ‘थोड़ा-सा’, ‘थोड़ी-सी’, ‘थोड़े-से’ की आवृत्ति से लय उत्पन्न हुई है। भाषा अत्यंत सरल और आम बोलचाल की है (उर्दू शब्द ‘उम्मीद’ और तत्सम ‘विश्वास’ का मिला-जुला प्रयोग)।
7. बस्तियों को शहर की किस आबो-हवा से बचाने की आवश्यकता है?
बस्तियों को शहर की ‘नंगी’ (भावहीन और पर्यावरण विरोधी) आबो-हवा से बचाने की आवश्यकता है।
शहरी संस्कृति में कृत्रिमता, अलगाव, प्रदूषण और संवेदनहीनता है। कवयित्री चाहती हैं कि उनकी बस्तियाँ इन शहरी विकृतियों से दूर रहें और अपनी प्राकृतिक पवित्रता बनाए रखें।
शहरी संस्कृति में कृत्रिमता, अलगाव, प्रदूषण और संवेदनहीनता है। कवयित्री चाहती हैं कि उनकी बस्तियाँ इन शहरी विकृतियों से दूर रहें और अपनी प्राकृतिक पवित्रता बनाए रखें।
कविता के आस-पास (Around the Lesson)
1. आप अपने शहर या बस्ती की किन चीज़ों को बचाना चाहेंगे?
(स्व-विचार) मैं अपने शहर/बस्ती की निम्नलिखित चीज़ों को बचाना चाहूँगा:
- पुराने पेड़ और खेल के मैदान।
- पड़ोसियों के बीच का अपनापन और संवाद।
- बुजुर्गों का सम्मान और संयुक्त परिवार की परंपरा।
- ताजी हवा और साफ पानी।
2. आदिवासी समाज की वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करें।
आज आदिवासी समाज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है।
एक तरफ वे शिक्षा और आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं, जो अच्छी बात है। लेकिन दूसरी तरफ, औद्योगिकीकरण और विस्थापन के कारण उनकी जल, जंगल और ज़मीन छिन रही है। उनकी भाषा और संस्कृति पर अस्तित्व का संकट गहरा रहा है। वे अपनी जड़ों से कटकर शहरों में मजदूर बनने को विवश हो रहे हैं।
एक तरफ वे शिक्षा और आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं, जो अच्छी बात है। लेकिन दूसरी तरफ, औद्योगिकीकरण और विस्थापन के कारण उनकी जल, जंगल और ज़मीन छिन रही है। उनकी भाषा और संस्कृति पर अस्तित्व का संकट गहरा रहा है। वे अपनी जड़ों से कटकर शहरों में मजदूर बनने को विवश हो रहे हैं।
शब्द-छवि (Word Meanings)
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| आबो-हवा | जलवायु / वातावरण (Climate/Environment) |
| माटी | मिट्टी (Soil/Earth) |
| सोंधापन | मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू (Earthy Scent) |
| उम्मीद | आशा (Hope) |
| दौर | समय / काल (Era/Phase) |
| अक्खड़पन | रुखाई से तन जाने का भाव (Roughness/Obstinacy) |
| जुझारूपन | संघर्ष करने की प्रवृत्ति (Resilience/Fighting spirit) |