गलता लोहा (Galta Loha)
एनसीईआरटी समाधान • कक्षा 11 हिंदी (आरोह) • शेखर जोशीपाठ के साथ (Textbook Questions)
1. कहानी के उस प्रसंग का उल्लेख करें, जिसमें किताबों की विद्या और घन चलाने की विद्या का ज़िक्र आया है।
यह प्रसंग तब आता है जब धनराम 13 का पहाड़ा याद नहीं कर पाता।
मास्टर त्रिलोक सिंह उसे सजा देते हुए व्यंग्य करते हैं कि “तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है, इसमें विद्या का ताप कहाँ लगेगा?”
यहाँ लेखक ने तुलना की है कि एक तरफ ‘किताबों की विद्या’ (पढ़ाई) है और दूसरी तरफ ‘घन चलाने की विद्या’ (लोहार का काम), जिसे धनराम अपने पिता से सीख रहा था।
मास्टर त्रिलोक सिंह उसे सजा देते हुए व्यंग्य करते हैं कि “तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है, इसमें विद्या का ताप कहाँ लगेगा?”
यहाँ लेखक ने तुलना की है कि एक तरफ ‘किताबों की विद्या’ (पढ़ाई) है और दूसरी तरफ ‘घन चलाने की विद्या’ (लोहार का काम), जिसे धनराम अपने पिता से सीख रहा था।
2. धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी क्यों नहीं समझता था?
धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी इसलिए नहीं समझता था क्योंकि:
- जातिगत हीनता: धनराम नीची जाति (लोहार) का था और मोहन ऊँची जाति (ब्राह्मण) का। बचपन से ही उसके मन में यह बात बैठा दी गई थी कि वह मोहन की बराबरी नहीं कर सकता।
- बुद्धि का अंतर: मोहन कक्षा का सबसे होनहार छात्र था, जबकि धनराम मंदबुद्धि। धनराम मोहन के प्रति आदर और स्नेह का भाव रखता था, ईर्ष्या का नहीं।
3. धनराम को मोहन के किस व्यवहार पर आश्चर्य होता है और क्यों?
धनराम को तब आश्चर्य होता है जब **मोहन (एक ब्राह्मण युवक) उसकी भट्ठी पर बैठकर लोहे के छड़ को कुशलता से गोल आकार देता है।**
क्यों: गाँव के सामाजिक नियमों के अनुसार, ब्राह्मण टोले के लोग शिल्पकार टोले में उठते-बैठते नहीं थे। मोहन ने न केवल वहाँ बैठकर काम किया बल्कि अपनी जातिगत श्रेष्ठता के अहंकार को भुलाकर ‘सर्जक’ की तरह काम किया। यह धनराम के लिए अकल्पनीय था।
क्यों: गाँव के सामाजिक नियमों के अनुसार, ब्राह्मण टोले के लोग शिल्पकार टोले में उठते-बैठते नहीं थे। मोहन ने न केवल वहाँ बैठकर काम किया बल्कि अपनी जातिगत श्रेष्ठता के अहंकार को भुलाकर ‘सर्जक’ की तरह काम किया। यह धनराम के लिए अकल्पनीय था।
4. मोहन के लखनऊ आने के बाद के समय को लेखक ने उसके जीवन का ‘एक नया अध्याय’ क्यों कहा है?
लेखक ने इसे नया अध्याय इसलिए कहा क्योंकि यहाँ से मोहन के जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई (पतन की ओर)।
गाँव का मेधावी छात्र मोहन, लखनऊ में एक **घरेलू नौकर** बनकर रह गया। रमेश (बिरादरी का भाई) ने उसे पढ़ाने के बहाने लाया था, लेकिन उसने मोहन का शोषण किया। उसकी प्रतिभा दब गई और उसका भविष्य अंधकारमय हो गया।
गाँव का मेधावी छात्र मोहन, लखनऊ में एक **घरेलू नौकर** बनकर रह गया। रमेश (बिरादरी का भाई) ने उसे पढ़ाने के बहाने लाया था, लेकिन उसने मोहन का शोषण किया। उसकी प्रतिभा दब गई और उसका भविष्य अंधकारमय हो गया।
5. मास्टर त्रिलोक सिंह के किस कथन को लेखक ने ‘ज़बान के चाबुक’ कहा है और क्यों?
कथन: “तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे! विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें?”
क्यों: शारीरिक मार (छड़ी) का दर्द समय के साथ खत्म हो जाता है, लेकिन अपमानजनक शब्द (ज़बान के चाबुक) मन पर गहरा घाव करते हैं। इस कथन ने धनराम को मानसिक रूप से तोड़ दिया और उसे यह मानने पर मजबूर कर दिया कि पढ़ाई उसके बस की बात नहीं है।
क्यों: शारीरिक मार (छड़ी) का दर्द समय के साथ खत्म हो जाता है, लेकिन अपमानजनक शब्द (ज़बान के चाबुक) मन पर गहरा घाव करते हैं। इस कथन ने धनराम को मानसिक रूप से तोड़ दिया और उसे यह मानने पर मजबूर कर दिया कि पढ़ाई उसके बस की बात नहीं है।
6. (1) “बिरादरी का यही सहारा होता है।”
(क) किसने किससे कहा?
मोहन के पिता वंशीधर ने रमेश (बिरादरी के युवक) से कहा।
(ख) किस प्रसंग में?
जब रमेश ने मोहन को लखनऊ ले जाकर पढ़ाने की जिम्मेदारी ली।
(ग) किस आशय से?
कृतज्ञता प्रकट करते हुए कि अपनी जाति के लोग ही मुसीबत में काम आते हैं।
(घ) क्या आशय स्पष्ट हुआ?
नहीं। कहानी में यह व्यंग्य सिद्ध हुआ क्योंकि उसी ‘बिरादरी’ के रमेश ने मोहन का शोषण कर उसे नौकर बना दिया।
मोहन के पिता वंशीधर ने रमेश (बिरादरी के युवक) से कहा।
(ख) किस प्रसंग में?
जब रमेश ने मोहन को लखनऊ ले जाकर पढ़ाने की जिम्मेदारी ली।
(ग) किस आशय से?
कृतज्ञता प्रकट करते हुए कि अपनी जाति के लोग ही मुसीबत में काम आते हैं।
(घ) क्या आशय स्पष्ट हुआ?
नहीं। कहानी में यह व्यंग्य सिद्ध हुआ क्योंकि उसी ‘बिरादरी’ के रमेश ने मोहन का शोषण कर उसे नौकर बना दिया।
6. (2) “उसकी आँखों में एक सर्जक की चमक थी…”
(क) किसके लिए कहा गया? मोहन के लिए।
(ख) किस प्रसंग में? जब मोहन ने लोहे की छड़ को भट्ठी में तपाकर और हथौड़े से पीटकर बिल्कुल गोल (सुघड़) बना दिया।
(ग) चारित्रिक पहलू: यह दिखाता है कि मोहन जाति के बंधनों से ऊपर उठ चुका था। उसे काम में परफेक्शन (दक्षता) पसंद थी और वह श्रम का सम्मान करता था।
(ख) किस प्रसंग में? जब मोहन ने लोहे की छड़ को भट्ठी में तपाकर और हथौड़े से पीटकर बिल्कुल गोल (सुघड़) बना दिया।
(ग) चारित्रिक पहलू: यह दिखाता है कि मोहन जाति के बंधनों से ऊपर उठ चुका था। उसे काम में परफेक्शन (दक्षता) पसंद थी और वह श्रम का सम्मान करता था।
पाठ के आस-पास (Around the Lesson)
1. गाँव और शहर, दोनों जगहों पर चलने वाले मोहन के जीवन-संघर्ष में क्या फर्क है?
- गाँव में: संघर्ष गरीबी और साधनों की कमी का था। उसे नदी पार करके स्कूल जाना पड़ता था, लेकिन उसे अपनी प्रतिभा पर गर्व और सम्मान मिलता था।
- शहर (लखनऊ) में: संघर्ष अस्मिता (Identity) और अस्तित्व का था। यहाँ वह सुविधाओं के बीच भी मानसिक प्रताड़ना, शोषण और नौकरों जैसा जीवन जीने को मजबूर था। उसका आत्मसम्मान कुचल दिया गया था।
2. एक अध्यापक के रूप में त्रिलोक सिंह का व्यक्तित्व।
खूबियाँ: वे अनुशासित थे, बच्चों को पढ़ाने की लगन थी, और होनहार छात्रों (मोहन) को प्रोत्साहित करते थे।
खामियाँ: वे जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त थे (धनराम को नीचा दिखाना)। वे शारीरिक दंड और मानसिक प्रताड़ना (ज़बान के चाबुक) का प्रयोग करते थे, जो एक शिक्षक के लिए अनुचित है।
खामियाँ: वे जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त थे (धनराम को नीचा दिखाना)। वे शारीरिक दंड और मानसिक प्रताड़ना (ज़बान के चाबुक) का प्रयोग करते थे, जो एक शिक्षक के लिए अनुचित है।
भाषा की बात (Language Study)
1. लौहकर्म से संबंधित शब्दों का प्रयोजन (Use):
- धौंकनी: आग को दहकाने/तेज करने के लिए हवा फूँकने का यंत्र।
- दराँती: घास या फसल काटने का औजार (हँसिया)।
- सँड़सी: गर्म लोहे को पकड़ने का औजार।
- आफर: भट्ठी (जहाँ लोहार काम करता है)।
- हथौड़ा: लोहे को पीटने/आकार देने का भारी औजार।
2. ‘काट-छाँटकर’ जैसे संयुक्त क्रिया शब्द (Compound Verbs):
- उठा-पटक: बच्चों ने कक्षा में बहुत उठा-पटक की।
- पढ़-लिखकर: वह पढ़-लिखकर अफसर बनना चाहता है।
- घूम-फिरकर: हम शाम को घूम-फिरकर वापस आ गए।
- हँस-बोलकर: रास्ता हँस-बोलकर आसानी से कट गया।
- देख-परखकर: सब्जी हमेशा देख-परखकर लेनी चाहिए।
3. ‘बूते’ का प्रयोग और संदर्भ:
- संदर्भ 1: “वंशीधर के बूते का अब यह काम नहीं रहा।” (अर्थ: सामर्थ्य/शक्ति – बुढ़ापे के कारण)।
- संदर्भ 2: “दान-दक्षिणा के बूते पर वे घर चलाते थे।” (अर्थ: सहारे/आधार पर)।
- संदर्भ 3: “सीधी चढ़ाई चढ़ना पशोपेश के बूते की बात नहीं थी।” (अर्थ: वश की बात)।
4. सर्वनाम का इस्तेमाल (Pronoun Usage):
मूल वाक्य: मोहन! थोड़ा दही तो ला दे… मोहन! ये कपड़े…
पुनर्लेखन:
“मोहन! तुम बाज़ार से थोड़ा दही तो ला दो। और हाँ, आते समय ये कपड़े धोबी को दे आना। साथ ही, एक किलो आलू भी लेते आना।”
पुनर्लेखन:
“मोहन! तुम बाज़ार से थोड़ा दही तो ला दो। और हाँ, आते समय ये कपड़े धोबी को दे आना। साथ ही, एक किलो आलू भी लेते आना।”
शब्द-छवि (Word Meanings)
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| निहाई | लोहे का ठोस टुकड़ा जिस पर धातु रखकर पीटी जाती है (Anvil) |
| अनायास | बिना प्रयास के / आसानी से |
| अनुगूँज | प्रतिध्वनि (Echo) |
| हँसुवे | घास काटने का औजार (Sickle) |
| पुरोहितार्इ | पंडिताई / पूजा-पाठ का पेशा |
| निष्ठा | श्रद्धा / विश्वास |
| धौंकनी | आग तेज करने की नली (Bellows) |
| कुशाग्र बुद्धि | तेज बुद्धि वाला |
| संटी | पतली छड़ी |
| प्रतिद्वंद्वी | मुकाबला करने वाला / विरोधी |
| विद्याव्यसनी | पढ़ने में रुचि रखने वाला |