Class 11 Hindi Vitan Chapter 1 Solutions: Lata Mangeshkar | learncbsehub
NCERT Class 11 Hindi Vitan – Chapter 1

भारतीय गायिकाओं में बेजोड़: लता मंगेशकर

लेखक: कुमार गंधर्व
🎵 पाठ के साथ (प्रश्न-अभ्यास)
प्रश्न 1
लेखक ने पाठ में ‘गानपन’ का उल्लेख किया है। पाठ के संदर्भ में स्पष्ट करते हुए बताएँ कि आपके विचार में इसे प्राप्त करने के लिए किस प्रकार के अभ्यास की आवश्यकता है?
‘गानपन’ का अर्थ है— गाने में मौजूद मिठास और मस्ती। जिस प्रकार मनुष्यता मनुष्य का धर्म है, उसी प्रकार गानपन संगीत का धर्म है। श्रोता को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि कौन-सा राग गाया जा रहा है, वह तो केवल उस मिठास और आनंद को महसूस करना चाहता है जो उसे भाव-विभोर कर दे।

मेरे विचार से ‘गानपन’ प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित अभ्यास आवश्यक हैं:
  • स्वरों के उचित ज्ञान के साथ-साथ आवाज़ में लोच और मिठास लाने का निरंतर अभ्यास।
  • स्वरों के निर्मल और कोमल उच्चारण पर ध्यान देना।
  • शब्दों के अर्थ और भावों में डूबकर गाने की कला।
  • शास्त्रीय संगीत की तकनीक को केवल आधार बनाना, न कि उसे ही सब कुछ मानना।
प्रश्न 2
लेखक ने लता की गायिकी की किन विशेषताओं को उजागर किया है? आपको लता की गायिकी में कौन-सी विशेषताएँ नज़र आती हैं? उदाहरण सहित बताइए।
लेखक कुमार गंधर्व ने लता मंगेशकर की गायिकी की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई हैं, जो हमें भी स्पष्ट नज़र आती हैं:
  1. सुरीलापन और गानपन: लता जी के स्वर में अद्भुत मिठास है जो सीधे दिल को छूती है।
  2. स्वरों की निर्मलता: उनका जीवन के प्रति जो कोमल दृष्टिकोण है, वह उनके स्वरों की पवित्रता में झलकता है।
  3. नादमय उच्चार: उनके गीतों में किन्हीं दो शब्दों का अंतर स्वरों के आलाप द्वारा इतनी सुंदरता से भरा जाता है कि दोनों शब्द एक-दूसरे में विलीन होते प्रतीत होते हैं।
  4. कोमलता और मुग्धता: उनके गायन में चिल्लाहट नहीं, बल्कि एक सहज कोमलता है।
प्रश्न 3
‘लता ने करुण रस के गानों के साथ न्याय नहीं किया है, जबकि शृंगारपरक गाने वे बड़ी उत्कटता से गाती हैं’— इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
मैं लेखक के इस कथन से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। यह लेखक की निजी राय हो सकती है कि लता जी श्रृंगार रस के गीतों में अधिक सफल हैं, और करुण रस में कम।

वास्तविकता यह है कि लता जी ने करुण रस के गीतों में भी अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा है। उनका गाया गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों” सुनकर पंडित नेहरू की आँखों में भी आँसू आ गए थे। इसके अलावा ‘रुला के गया सपना मेरा’ जैसे गीतों में विरह और करुणा की गहराई स्पष्ट दिखाई देती है। अतः यह कहना उचित नहीं होगा कि उन्होंने करुण रस के साथ न्याय नहीं किया है।
प्रश्न 4
‘संगीत का क्षेत्र ही विस्तीर्ण है। वहाँ अब तक अलक्षित, असंशोधित और अदृष्टिपूर्व ऐसा खूब बड़ा प्रांत है तथापि बड़े जोश से इसकी खोज और उपयोग चित्रपट के लोग करते चले आ रहे हैं’— इस कथन को वर्तमान फिल्मी संगीत के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
यह कथन वर्तमान फिल्मी संगीत पर पूरी तरह सटीक बैठता है। चित्रपट (फिल्मी) संगीत ने शास्त्रीय संगीत की rigid (कठोर) सीमाओं को तोड़कर संगीत को नए आयाम दिए हैं।
  • संगीतकारों ने लोकगीतों, पहाड़ी गीतों, और पाश्चात्य संगीत का अद्भुत मिश्रण किया है।
  • आज के संगीत में नए वाद्य यंत्रों और तकनीक का प्रयोग हो रहा है।
  • राजस्थानी, पंजाबी, बंगाली और दक्षिण भारतीय लोकधुनों का प्रयोग कर इसे और समृद्ध बनाया गया है।
अतः चित्रपट संगीत नित्य नए प्रयोग कर रहा है और उसकी संभावनाएँ अनंत हैं।
प्रश्न 5
‘चित्रपट संगीत ने लोगों के कान बिगाड़ दिए’— अक्सर यह आरोप लगाया जाता रहा है। इस संदर्भ में कुमार गंधर्व की राय और अपनी राय लिखें।
कुमार गंधर्व की राय: कुमार गंधर्व इस आरोप को गलत मानते हैं। उनका कहना है कि चित्रपट संगीत ने लोगों के कान बिगाड़े नहीं, बल्कि सुधारे हैं। इसी के कारण आम आदमी को सुर, ताल और लय की समझ आने लगी है।

मेरी राय: मैं कुमार गंधर्व से सहमत हूँ। पुराने समय में संगीत केवल राजा-महाराजाओं या विशिष्ट वर्गों तक सीमित था। फिल्मी संगीत ने इसे जन-जन तक पहुँचाया है। आज एक सामान्य व्यक्ति भी अच्छे सुर और बेसुरेपन में अंतर कर सकता है। संगीत में लोगों की रुचि बढ़ाने का श्रेय चित्रपट संगीत को ही जाता है।
प्रश्न 6
शास्त्रीय एवं चित्रपट दोनों तरह के संगीतों के महत्व का आधार क्या होना चाहिए? कुमार गंधर्व की इस संबंध में क्या राय है? स्वयं आप क्या सोचते हैं?
कुमार गंधर्व के अनुसार, चाहे शास्त्रीय संगीत हो या चित्रपट संगीत, दोनों के महत्व का आधार ‘रंजकता’ (मनोरंजन और आनंद) होना चाहिए।

जिस गाने में मिठास, मस्ती और सुनने वाले को मंत्रमुग्ध करने की क्षमता न हो, वह गाना व्यर्थ है, चाहे वह शुद्ध शास्त्रीय ही क्यों न हो। “गाना, गाना चाहिए, वह केवल शास्त्रीय व्यायाम नहीं होना चाहिए।”
मैं भी यही सोचता/सोचती हूँ कि संगीत का मुख्य उद्देश्य आत्मा को शांति और आनंद देना है। जो संगीत श्रोता के दिल को छू ले, वही श्रेष्ठ है।
💡 कुछ करने और सोचने के लिए
गतिविधि 1
पाठ में किए गए अंतरों के अलावा संगीत शिक्षक से चित्रपट संगीत एवं शास्त्रीय संगीत का अंतर पता करें। इन अंतरों को सूचीबद्ध करें।
शास्त्रीय संगीत:
  • इसमें गंभीरता (Gambhirta) मुख्य गुण है।
  • इसमें ताल और सुर के पक्के नियमों का पालन अनिवार्य है।
  • इसमें ध्रुपद, धमार आदि तालों का प्रयोग होता है जो विस्तृत होती हैं।

चित्रपट संगीत:
  • इसमें चपलता (Japalta) या चंचलता मुख्य गुण है।
  • इसमें नियमों में लचीलापन होता है, मुख्य उद्देश्य रंजकता है।
  • इसमें गीत और आघात को अधिक महत्व दिया जाता है, और आधे तालों (Half beats) का प्रयोग सुगमता के लिए होता है।
गतिविधि 2
कुमार गंधर्व ने लिखा है— ‘चित्रपट संगीत गाने वाले को शास्त्रीय संगीत की उत्तम जानकारी होना आवश्यक है’। क्या शास्त्रीय गायकों को भी चित्रपट संगीत से कुछ सीखना चाहिए? कक्षा में विचार-विमर्श करें।
हाँ, शास्त्रीय गायकों को भी चित्रपट संगीत से बहुत कुछ सीखना चाहिए:
  • लोच और मिठास: अक्सर शास्त्रीय गायक तकनीक में इतने खो जाते हैं कि गाने का ‘गानपन’ कम हो जाता है। चित्रपट संगीत से वे आवाज़ में लोच और भाव-प्रवणता सीख सकते हैं।
  • शब्द उच्चारण: शब्दों को स्पष्ट और भावपूर्ण तरीके से कैसे उच्चारित किया जाए, यह फिल्मी गायकों (जैसे लता जी) से सीखा जा सकता है।
  • संक्षिप्तता: कम समय में (3-4 मिनट में) पूरी बात और पूरा भाव कैसे व्यक्त किया जाए, यह कला चित्रपट संगीत सिखाता है।
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