आलो आँधारि (Aalo Aandhari)

एनसीईआरटी समाधान • कक्षा 11 हिंदी (वितान) • बेबी हालदार
अभ्यास (Exercises)
1. पाठ के किन अंशों से समाज की यह सच्चाई उजागर होती है कि पुरुष के बिना स्त्री का कोई अस्तित्व नहीं है? क्या वर्तमान समय में स्त्रियों की इस सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन आया है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
पाठ का अंश: बेबी हालदार जब अपने पति को छोड़कर बच्चों के साथ रहने लगती है, तो उसे मकान किराए पर लेने में बहुत दिक्कत होती है। लोग उससे अजीब सवाल पूछते हैं—”तेरा साहब (पति) कहाँ है?” या “अकेली औरत को हम मकान नहीं देते।” यह स्पष्ट करता है कि समाज अकेली स्त्री को सम्मान की नज़रों से नहीं देखता। उसे हर कदम पर पुरुष के सहारे की जरूरत महसूस कराई जाती है।

वर्तमान स्थिति: हाँ, वर्तमान समय में इसमें परिवर्तन आया है, विशेषकर शहरी क्षेत्रों में।
  • शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता ने स्त्रियों को सशक्त किया है।
  • कानून (जैसे एकल माताओं के अधिकार) अब महिलाओं के पक्ष में हैं।
  • तर्क: आज कई महिलाएँ ‘सिंगल मदर’ के रूप में गर्व से रह रही हैं, लेकिन ग्रामीण या रूढ़िवादी समाज में अब भी सोच पूरी तरह नहीं बदली है।
2. अपने परिवार से तातुश के घर तक के सफ़र में बेबी के सामने रिश्तों की कौन-सी सच्चाई उजागर होती है?
बेबी के सामने रिश्तों की यह कड़वी सच्चाई उजागर होती है कि “रिश्ते खून के नहीं, बल्कि भावना और व्यवहार के होते हैं।”
  • अपने पराए हो गए: उसके पति ने उसे प्रताड़ित किया, और भाई-भाभी ने भी बुरे वक्त में पूरा साथ नहीं दिया।
  • पराए अपने हो गए: तातुश (लेखक प्रबोध कुमार) एक अनजान व्यक्ति थे, लेकिन उन्होंने बेबी को बेटी जैसा सम्मान दिया, उसे लिखना सिखाया और सहारा दिया। इससे सिद्ध हुआ कि मानवता और प्रेम ही सबसे बड़ा रिश्ता है।
3. इस पाठ से घरों में काम करने वालों के जीवन की जटिलताओं का पता चलता है। घरेलू नौकरों को और किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है? इस पर विचार करिए।
पाठ के अलावा, घरेलू नौकरों को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता है:
  • आर्थिक शोषण: काम के घंटे निश्चित नहीं होते, पर वेतन बहुत कम होता है।
  • आत्मसम्मान की कमी: उन्हें अक्सर शक की निगाह से देखा जाता है और अपमानित किया जाता है।
  • असुरक्षा: नौकरी की कोई गारंटी नहीं होती। बीमारी या छुट्टी लेने पर पैसे काट लिए जाते हैं।
  • शारीरिक व मानसिक शोषण: कई जगह उनके साथ मार-पीट या यौन शोषण जैसी घटनाएँ भी होती हैं।
  • अस्वच्छ आवास: वे अक्सर झुग्गी-झोपड़ियों में बुनियादी सुविधाओं के बिना रहने को मजबूर होते हैं।
4. ‘आलो-आँधारि’ रचना बेबी की व्यक्तिगत समस्याओं के साथ-साथ कई सामाजिक मुद्दों को समेटे है। किन्हीं दो मुख्य समस्याओं पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
1. झुग्गी-बस्तियों की दुर्दशा: पाठ में मलिन बस्तियों का भयावह चित्रण है। वहाँ पानी की किल्लत, गंदगी और सार्वजनिक शौचालयों की कमी है। यह दिखाता है कि शहरों के विकास के बीच गरीबों का जीवन कितना नारकीय है।

2. स्त्री-उत्पीड़न और घरेलू हिंसा: बेबी का पति उसे बिना कारण मारता-पीटता था। यह केवल बेबी की कहानी नहीं, बल्कि हमारे समाज की एक गहरी समस्या है जहाँ पुरुष अपनी ताकत का प्रदर्शन स्त्री पर करता है और समाज इसे ‘निजी मामला’ मानकर चुप रहता है।
5. “तुम दूसरी आशापूर्णा देवी बन सकती हो” — जेठू का यह कथन रचना संसार के किस सत्य को उद्घाटित करता है?
जेठू का यह कथन इस सत्य को उद्घाटित करता है कि “प्रतिभा किसी सुविधा, डिग्री या उच्च वर्ग की मोहताज नहीं होती।”
आशापूर्णा देवी एक प्रसिद्ध बंगाली लेखिका थीं जो एक सामान्य गृहिणी थीं और घर के काम करते हुए साहित्य रचना करती थीं। बेबी हालदार, जो एक घरेलू नौकरानी थी, के अंदर भी वही क्षमता थी। यदि मनुष्य में लगन हो और उसे सही प्रोत्साहन (तातुश जैसा) मिले, तो अभावों के बीच भी साहित्य का सृजन हो सकता है।
6. बेबी की ज़िंदगी में तातुश का परिवार न आया होता तो उसका जीवन कैसा होता? कल्पना करें और लिखें।
यदि तातुश का परिवार बेबी की ज़िंदगी में न आया होता, तो उसका जीवन संभवतः अंधकार (‘आँधारि’) में ही डूबा रहता:
  • वह ताउम्र दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा करती रह जाती।
  • उसकी लेखन प्रतिभा कभी बाहर नहीं आ पाती और दुनिया ‘बेबी हालदार’ के नाम से परिचित न होती।
  • गरीबी और आर्थिक तंगी के कारण शायद वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पाती।
  • संभव है कि हताशा में वह वापस अपने अत्याचारी पति के पास लौटने को मजबूर हो जाती।
7. “सबेरे कोई पेशाब के लिए उसमें घुसता तो दूसरा उसमें घुसने के लिए बाहर खड़ा रहता… मुझे तो यह देख-सुनकर बहुत खराब लगता” — यह अनुवाद की गुणवत्ता पर टिप्पणी है। आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं?
“अनुवाद के नाम पर मात्र अंग्रेज़ी से होने वाले अनुवादों के बीच भारतीय भाषाओं में रची-बसी हिंदी का यह एक अनुकरणीय नमूना है।”
मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ।
प्रस्तुत पंक्तियाँ मूल रूप से बांग्ला में लिखी गई थीं, लेकिन हिंदी अनुवाद इतना सहज और स्वाभाविक है कि लगता ही नहीं यह अनुवाद है।
  • दृश्य बिंब: भाषा में इतनी शक्ति है कि गंदगी, भीड़ और विवशता का दृश्य आँखों के सामने जीवंत हो उठता है।
  • देशज पुट: इसमें ‘कृत्रिमता’ नहीं है। झुग्गी-बस्ती की भाषा और माहौल को हू-ब-हू हिंदी में उतारा गया है।
  • यह सिद्ध करता है कि भारतीय भाषाओं (बांग्ला से हिंदी) के बीच अनुवाद अधिक संवेदनापूर्ण और सटीक होता है क्योंकि दोनों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि समान है।
चर्चा करें (Discussion)
पाठ में आए इन व्यक्तियों का देश के लिए विशेष रचनात्मक महत्त्व है। इनके बारे में जानकारी प्राप्त करें:
  • श्री रामकृष्ण (परमहंस): महान संत और विचारक। स्वामी विवेकानंद के गुरु। उन्होंने ‘सर्वधर्म समभाव’ का संदेश दिया।
  • रवींद्रनाथ ठाकुर: नोबेल पुरस्कार विजेता कवि, लेखक और चित्रकार। ‘गीतांजलि’ उनकी प्रसिद्ध रचना है। उन्होंने भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान लिखे।
  • काज़ी नज़रुल इस्लाम: ‘विद्रोही कवि’ के नाम से मशहूर। उनकी कविताएँ स्वतंत्रता संग्राम में प्रेरणा बनीं।
  • शरतचंद्र: प्रसिद्ध बांग्ला उपन्यासकार। ‘देवदास’, ‘परिणीता’ जैसी रचनाओं में उन्होंने समाज और स्त्रियों की पीड़ा को उकेरा।
  • सत्येंद्र नाथ दत्त: बांग्ला साहित्य के प्रसिद्ध कवि, जिन्हें ‘छंदों का जादूगर’ कहा जाता है।
  • सुकुमार राय: सत्यजित राय के पिता। वे बच्चों के साहित्य और ‘नॉनसेंस राइम’ (Nonsense Rhyme) के लिए प्रसिद्ध थे।
  • ऐनी फ्रैंक: एक यहूदी लड़की जिसकी ‘डायरी’ (The Diary of a Young Girl) नाजी अत्याचारों का जीवंत दस्तावेज है। बेबी हालदार की तुलना उनसे इसलिए की जाती है क्योंकि दोनों ने संघर्ष के बीच अपने अनुभव लिखे।
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