भारतीय कलाएँ (Bharatiya Kalayein)

एनसीईआरटी समाधान • कक्षा 11 हिंदी (वितान)
अभ्यास (Exercises)
1. कला और भाषा के अंतर्संबंध पर आपकी क्या राय है? लिखकर बताएँ।
कला और भाषा का संबंध अत्यंत गहरा और अटूट है।
  • अभिव्यक्ति का माध्यम: दोनों का उद्देश्य मानवीय भावनाओं और विचारों को व्यक्त करना है। जहाँ भाषा ‘शब्दों’ का सहारा लेती है, वहीं कला ‘रंगों, रेखाओं, स्वरों और मुद्राओं’ का सहारा लेती है।
  • पूरक संबंध: भाषा के बिना कला का वर्णन अधूरा है, और कला के बिना भाषा नीरस है। प्राचीन काल में चित्रलिपि (कला) ही भाषा का प्रारंभिक रूप थी।
  • संस्कृति का संरक्षण: दोनों मिलकर किसी देश की संस्कृति को सुरक्षित रखते हैं। साहित्य (भाषा) और स्थापत्य (कला) दोनों ही इतिहास गढ़ते हैं।
2. भारतीय कलाओं और भारतीय संस्कृति में आप किस तरह का संबंध पाते हैं?
भारतीय कलाएँ भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं।
  • त्योहार और उत्सव: भारत का कोई भी त्योहार कला के बिना पूरा नहीं होता। चाहे दीपावली की रंगोली हो, होली के रंग, या नवरात्रि का गरबा (नृत्य), सब जगह कला मौजूद है।
  • धार्मिक अनुष्ठान: पूजा-पाठ में संगीत (भजन), चित्रकला (अल्पना/मांडना) और मूर्तिकला का विशेष महत्व है।
  • अखंडता: भारत की संस्कृति ‘विविधता में एकता’ वाली है और यही झलक हमारी कलाओं में मिलती है। अलग-अलग राज्यों की लोककलाएँ मिलकर एक समग्र ‘भारतीय संस्कृति’ का निर्माण करती हैं।
3. “शास्त्रीय कलाओं का आधार जनजातीय और लोक कलाएँ हैं” — अपनी सहमति और असहमति के पक्ष में तर्क दें।
मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ।
तर्क:
  • उद्भव: मानव ने सबसे पहले अपनी भावनाएँ लोकगीतों और मिट्टी के चित्रों (लोक कला) के माध्यम से व्यक्त कीं। बाद में विद्वानों ने इन्हीं को नियमों में बांधकर ‘शास्त्रीय’ रूप दिया।
  • उदाहरण (संगीत): अनेक शास्त्रीय राग (जैसे- राग पहाड़ी, राग मांड, राग सोरठ) लोकधुनों पर ही आधारित हैं।
  • उदाहरण (चित्रकला): एलोरा और अजंता की गुफाओं में जो शास्त्रीय चित्रकारी है, उसकी नींव भीमबेटका जैसी गुफाओं की आदिम जनजातीय कला में देखी जा सकती है।
चर्चा करें (Discussion)
“साहित्य संगीत कला विहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः” — भर्तृहरि के इस कथन पर कक्षा में चर्चा करें।
साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः।
तृणं न खादन्नपि जीवमानः तद्भागधेयं परमं पशूनाम्।।
अर्थ: जो मनुष्य साहित्य, संगीत और कला से रहित है, वह बिना पूंछ और सींग वाले साक्षात पशु के समान है। यह पशुओं का सौभाग्य है कि ऐसा मनुष्य घास नहीं खाता (वरना पशुओं के लिए घास भी कम पड़ जाती)।

चर्चा के बिंदु:
  • संवेदनशीलता: कला मनुष्य के अंदर संवेदना (Sensitivity) और प्रेम जगाती है। इसके बिना मनुष्य केवल ‘खाने और सोने’ वाला प्राणी मात्र है।
  • हृदय का विस्तार: कला हमें स्वार्थ से ऊपर उठाकर परमानंद की अनुभूति कराती है।
  • जीवन की सार्थकता: केवल भौतिक सुखों (रोटी-कपड़ा) से जीवन पूर्ण नहीं होता; मानसिक और आत्मिक तृप्ति के लिए कला अनिवार्य है।
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