बाज़ार दर्शन

जैनेंद्र कुमार • आरोह भाग 2 (अध्याय 11)

बाज़ार का जादू: ‘पर्चेज़िंग पावर’ बनाम ‘संतोष’

पाठ के साथ (प्रश्न-उत्तर)

1. बाज़ार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?
जादू चढ़ने पर:
  • मनुष्य बाज़ार की चकाचौंध में खो जाता है।
  • वह गैर-ज़रूरी चीज़ों को भी ज़रूरी समझकर खरीदने लगता है।
  • उसे लगता है कि इन चीज़ों से उसका आराम बढ़ेगा, जबकि वे खलल डालती हैं।
  • उसका अहंकार (पर्चेज़िंग पावर) उसे फिजूलखर्ची के लिए उकसाता है।
जादू उतरने पर:
  • उसे वास्तविकता का भान होता है।
  • उसे पता चलता है कि फैंसी चीज़ें आराम नहीं देतीं, बल्कि जीवन में बाधा डालती हैं।
  • पश्चाताप और खालीपन महसूस होता है।
2. बाज़ार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभरकर आता है? क्या उनका आचरण समाज में शांति स्थापित करने में मददगार हो सकता है?
भगत जी के व्यक्तित्व का सबसे सशक्त पहलू है—‘मन पर नियंत्रण’ और ‘संतोष’

वे बाज़ार से केवल अपनी ज़रूरत का सामान (जीरा और नमक) खरीदते हैं और बाकी चकाचौंध से प्रभावित नहीं होते। उनका आचरण समाज में शांति स्थापित करने में अत्यंत मददगार है क्योंकि:
  • वे बाज़ार को सार्थकता देते हैं (ज़रूरत पूरी करना, शोषण नहीं)।
  • उनमें ईर्ष्या या प्रतिस्पर्धा (Competition) नहीं है।
  • जिस समाज में ऐसे संतोषी व्यक्ति होंगे, वहां महंगाई और धोखाधड़ी नहीं बढ़ेगी।
3. ‘बाज़ारूपन’ से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाज़ार को सार्थकता प्रदान करते हैं?
बाज़ारूपन: इसका अर्थ है बाज़ार को केवल लाभ कमाने और छल-कपट का जरिया बनाना। जब बाज़ार से सद्भावना खत्म हो जाती है और केवल ‘खरीदने और बेचने’ का रिश्ता रह जाता है, तो उसे बाज़ारूपन कहते हैं।

बाज़ार की सार्थकता: वही व्यक्ति बाज़ार को सार्थकता प्रदान करते हैं जो यह जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए। वे अपनी ज़रूरत का सामान खरीदते हैं, न कि ‘पर्चेज़िंग पावर’ दिखाने के लिए फिजूलखर्ची करते हैं।
4. बाज़ार किसी का लिंग, जाति, धर्म नहीं देखता; वह देखता है सिर्फ उसकी ‘क्रय शक्ति’ को। क्या यह एक प्रकार की सामाजिक समता है?
हाँ, बाज़ार एक प्रकार से सामाजिक समता भी रचता है, लेकिन यह एक ‘व्यावसायिक समता’ है।
बाज़ार के लिए हर ग्राहक समान है, चाहे वह राजा हो या रंक, बशर्ते उसकी जेब में पैसा (क्रय शक्ति) हो। वहाँ ऊँच-नीच या जाति-धर्म का भेद नहीं होता। लेकिन इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि यह मानवीय संवेदनाओं को खत्म करके केवल पैसों के रिश्ते को महत्व देता है।
5. आप अपने तथा समाज से कुछ ऐसे प्रसंग का उल्लेख करें जब (क) पैसा शक्ति का परिचायक हुआ, (ख) पैसा काम नहीं आया।
  • (क) पैसा शक्ति के रूप में: जब किसी अमीर व्यक्ति ने महंगी कार या आलीशान घर खरीदकर समाज में अपना रुतबा दिखाया और लोग उससे प्रभावित हुए।
  • (ख) पैसा काम नहीं आया: कोरोना काल या गंभीर बीमारी के समय, जब अस्पतालों में बेड या ऑक्सीजन की कमी थी, तब लाखों रुपये होने के बावजूद कई लोग अपने प्रियजनों की जान नहीं बचा सके। वहाँ पैसा बेबस हो गया।

पाठ के आस-पास (मन की स्थितियाँ)

1. बाज़ार जाने के संदर्भ में मन की स्थितियाँ: खाली मन, बंद मन, भरा मन।
मन खाली हो: जब हमें पता न हो कि हमें क्या चाहिए। इस स्थिति में बाज़ार का जादू सबसे ज़्यादा चलता है और हम सब कुछ खरीद लेना चाहते हैं।
मन बंद हो: जब हम ज़बरदस्ती इच्छाओं को दबा लेते हैं (शून्य होना)। यह सही नहीं है, क्योंकि इच्छाओं को रोकना हठ है, योग नहीं।
मन भरा हो: जब हमें अपनी ज़रूरत का पक्का पता हो (भगत जी की तरह)। इस स्थिति में बाज़ार का आकर्षण हमें डिगा नहीं सकता और हम केवल उपयोगी वस्तु ही खरीदते हैं।
5. ‘स्त्री माया न जोड़े…’ यहाँ ‘माया’ शब्द किस ओर संकेत कर रहा है?
यहाँ ‘माया’ शब्द धन-संपत्ति और भौतिक वस्तुओं के संग्रह की ओर संकेत कर रहा है।
स्त्रियों द्वारा माया जोड़ना अक्सर ‘परिस्थितिवश’ होता है क्योंकि उन्हें घर-गृहस्थी चलानी होती है और भविष्य की सुरक्षा (बच्चों की शादी, बीमारी आदि) की चिंता रहती है। यह उनकी मजबूरी और दूरदर्शिता है, न कि केवल लालच।

भाषा की बात (Grammar)

3. कोड मिक्सिंग (Code Mixing): हिंदी वाक्यों में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग।
पाठ में आए उदाहरण:
  1. पैसा पावर (Power) है।
  2. पैसे की उस पर्चेज़िंग पावर (Purchasing Power) के प्रयोग में ही पावर का रस है।
  3. मित्र ने सामने मनीबैग (Moneybag) फैला दिया।
  4. एनर्जी (Energy) नहीं बची।
  5. बाज़ार का अपील (Appeal) सम्मोहक है।
प्रभाव: यदि हम इनके स्थान पर हिंदी पर्याय (जैसे ‘शक्ति’, ‘क्रय-शक्ति’, ‘धन-थैली’) का प्रयोग करें, तो भाषा अधिक शुद्ध होगी, लेकिन बोलचाल का प्रवाह (Flow) थोड़ा बदल सकता है।
4. निपात (He, Bhi, To) का प्रयोग और अर्थ परिवर्तन।
(क) ‘ही’ (मात्र/Only):
  • मुझे ही जाना पड़ेगा। (कोई और नहीं जा सकता)
  • मुझे जाना ही पड़ेगा। (अनिवार्यता)
(ख) ‘भी’ (Also/Even):
  • मैं भी बाज़ार जाऊँगा। (दूसरों के साथ)
  • मैं बाज़ार भी जाऊँगा। (कहीं और जाने के अलावा)
(ग) तीनों का एक साथ प्रयोग:
“मुझे तो आज ही बाज़ार जाना भी है।”
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