पहलवान की ढोलक

फणीश्वरनाथ रेणु • आरोह भाग 2 (अध्याय 13)

जीजीविषा की आवाज़: मौत के सन्नाटे को चीरती ढोलक की थाप

पाठ के साथ (प्रश्न-उत्तर)

1. कुश्ती के समय ढोल की आवाज़ और लुट्टन के दाँव-पेंच में क्या तालमेल था?
लुट्टन का कोई गुरु नहीं था, उसने ढोल की आवाज़ को ही अपना गुरु माना था। ढोल की हर थाप उसे एक निर्देश देती थी:
ध्वन्यात्मक शब्द (ढोल की बोल) लुट्टन के लिए अर्थ (दाँव)
चट-धा, गिड़-धा आजा भिड़ जा (ललकारना)
चटाक्-चट्-धा उठाकर पटक दे
धाक-धिना, तिरकिट-तिना दाँव काटो, बाहर हो जाओ
धिना-धिना, धिक-धिना चित करो (जीत जाओ)
2. कहानी के किस-किस मोड़ पर लुट्टन के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए?
लुट्टन का जीवन संघर्षों से भरा था:
  1. बचपन: माता-पिता का देहांत, अनाथ हो गया। सास ने पाला।
  2. जवानी: श्यामनगर के दंगल में ‘चांद सिंह’ पहलवान को हराकर ‘राज-पहलवान’ बना। सुख-सुविधाएँ मिलीं।
  3. त्रासदी: राजा साहब की मृत्यु के बाद नए राजकुमार ने उसे दरबार से निकाल दिया। वह वापस गाँव आ गया।
  4. अंत: सूखा और महामारी में पत्नी और दोनों बेटों की मृत्यु हो गई। अंत में वह स्वयं भी मृत्यु को प्राप्त हुआ।
3. लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है?
लुट्टन ने कभी किसी उस्ताद से कुश्ती के पैंतरे नहीं सीखे थे। उसने बचपन से केवल ढोल की आवाज़ सुनी थी। जब वह दंगल में उतरा, तो ढोल की उत्तेजक आवाज़ ने ही उसकी नसों में बिजली भरी और उसे दाँव-पेंच के संकेत दिए। ढोल की थाप ही उसे लड़ने की प्रेरणा और युक्ति देती थी, इसलिए उसने ढोल को ही अपना गुरु माना।
4. गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान ढोल क्यों बजाता रहा?
गाँव में हैजा और मलेरिया फैला था। चारों तरफ मौत का सन्नाटा था।
लुट्टन अपनी ढोलक इसलिए बजाता रहा ताकि मरते हुए गाँव वालों में जीजीविषा (जीने की इच्छा) और हिम्मत बनी रहे। ढोलक की आवाज़ लोगों को बीमारी से लड़ने की शक्ति तो नहीं देती थी, पर उन्हें मौत से डरने नहीं देती थी। यह ‘संजीवनी शक्ति’ का काम करती थी।
5. ढोलक की आवाज़ का पूरे गाँव पर क्या असर होता था?
रात्रि की विभीषिका (डरावनापन) और सन्नाटे को ढोलक की आवाज़ ही चुनौती देती थी। जब लोगों के कानों में “धाक-धिना” की आवाज़ पड़ती, तो उनकी सुस्त नसों में बिजली दौड़ जाती। बूढ़े और बच्चे अपनी पीड़ा भूल जाते और उन्हें मृत्यु का भय कम लगता। उनकी आँखों के सामने दंगल का दृश्य आ जाता जिससे उन्हें मानसिक बल मिलता।
6. महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में क्या अंतर होता था?
सूर्योदय: लोग कांखते-कराहते अपने घरों से निकलते, एक-दूसरे को ढाँढस (सांत्वना) देते। जिनके घर में मौत हुई होती, वे रोने की बजाय चुप रहते ताकि दूसरों का हौसला न टूटे।

सूर्यास्त: शाम होते ही पूरा गाँव श्मशान सा शांत हो जाता। लोग अपनी झोपड़ियों में घुस जाते और चूँ-चपड़ भी नहीं करते। माँ अपने मरते हुए बच्चे को ‘बेटा’ कहकर पुकारने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाती थी। केवल सन्नाटा और अँधेरा होता था।

व्याख्या (Explanation)

8. आशय स्पष्ट करें: “आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो…”
आशय: लेखक ने गाँव की भयावह और करुण स्थिति का चित्रण किया है। अमावस्या की काली रात में सन्नाटा इतना गहरा था कि प्रकृति भी निष्ठुर लग रही थी।
‘भावुक तारा’ उन दैवीय शक्तियों या आशा की किरण का प्रतीक है जो शायद मदद करना चाहती हों, लेकिन वे भी पृथ्वी (गाँव) तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं। यानी गाँव वालों की पीड़ा इतनी गहरी थी कि कोई भी सांत्वना उन तक पहुँचने में असमर्थ थी।

भाषा की बात (शब्दावली)

विशिष्ट शब्दावली और क्षेत्र विशेष के शब्द
पाठ में कुश्ती से जुड़े शब्द (दाँव-पेंच, चित, पट, धोबिया पाट) प्रयोग हुए हैं।

अन्य क्षेत्रों के शब्द (उदाहरण):
  • चिकित्सा: ओपीडी, इंजेक्शन, शल्य-क्रिया, निदान, वेंटिलेटर।
  • क्रिकेट: गुगली, एलबीडब्ल्यू (LBW), हैट्रिक, क्रीज, मेडन ओवर।
  • न्यायालय: हलफनामा, जमानत, जिरह, मुवक्किल, समन।
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