शिरीष के फूल

हजारी प्रसाद द्विवेदी • आरोह भाग 2 (अध्याय 14)

जेठ की तपती दुपहरी में खिला अजेय शिरीष: जीवन की जिजीविषा का प्रतीक

पाठ के साथ (प्रश्न-उत्तर)

1. लेखक ने शिरीष को ‘कालजयी अवधूत’ (संन्यासी) की तरह क्यों माना है?
लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत माना है क्योंकि:
  • प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव: जैसे एक संन्यासी सुख-दुख में समान रहता है, वैसे ही शिरीष जेठ की भीषण गर्मी और लू में भी बिना मुरझाए फूलों से लदा रहता है।
  • मस्ती और फक्कड़पन: वह बाहरी वातावरण की कठोरता (काल के प्रहार) की परवाह किए बिना अपनी मस्ती में झूमता रहता है।
  • जीवन-शक्ति: वह वायुमंडल से रस खींचकर जीवित रहता है, जो एक सिद्ध योगी का लक्षण है।
2. ‘हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी ज़रूरी हो जाती है’—स्पष्ट करें।
शिरीष के फूल अत्यंत कोमल होते हैं, लेकिन उसके फल बहुत कठोर होते हैं। वे तब तक अपनी जगह (डाल) नहीं छोड़ते जब तक नए फल उन्हें धक्का देकर बाहर नहीं निकाल देते।

आशय: कोमलता को सुरक्षित रखने के लिए बाहरी आवरण का कठोर होना आवश्यक है। जीवन में भी, अपनी अच्छाई और आदर्शों को बचाने के लिए कभी-कभी हमें कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं या सख्त व्यवहार अपनाना पड़ता है ताकि संघर्षों का सामना किया जा सके।
3. द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रहकर ‘जिजीविषु’ बने रहने की सीख दी है। स्पष्ट करें।


लेखक का कहना है कि शिरीष भयंकर गर्मी, आंधी और लू (कोलाहल/संघर्ष) के बीच भी शांत और हरा-भरा रहता है।
यह हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें, अराजकता या भ्रष्टाचार क्यों न हो, हमें ‘जिजीविषु’ (जीने की अदम्य इच्छा रखने वाला) बने रहना चाहिए। हमें परिस्थितियों से हारने के बजाय शिरीष की तरह उनसे रस (जीवन शक्ति) खींचकर शान से जीना चाहिए।
4. ‘हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!’—ऐसा कहकर लेखक ने किस संकट की ओर संकेत किया है?
यहाँ ‘अवधूत’ से लेखक का संकेत महात्मा गांधी की ओर है।
गांधी जी भी शिरीष की तरह थे—कोमल हृदय लेकिन सिद्धांतों में कठोर, जो हिंसा और नफरत की आंधी में भी सत्य और अहिंसा पर अडिग रहे।
संकट: लेखक आज की ‘आत्मबल’ पर ‘देह-बल’ (हिंसा/ताकत) के वर्चस्व वाली सभ्यता को देखकर दुखी है। आज समाज में मूल्यों का ह्रास हो रहा है और गांधी जैसे निस्वार्थ, संयमी और मानवतावादी नेतृत्व की कमी है।
5. कवि (साहित्यकार) के लिए ‘अनासक्त योगी की स्थिरप्रज्ञता’ और ‘विदग्ध प्रेमी का हृदय’—एक साथ आवश्यक है। समझाइए।
द्विवेदी जी के अनुसार, श्रेष्ठ साहित्यकार वही है जिसमें दो विपरीत गुण हों:
  • अनासक्त योगी (Detached Ascetic): उसे संसार के सुख-दुख में लिप्त नहीं होना चाहिए। उसे निष्पक्ष होकर सत्य को देखने की ‘स्थिर बुद्धि’ (स्थिरप्रज्ञता) चाहिए।
  • विदग्ध प्रेमी (Passionate Lover): उसके हृदय में अपार प्रेम और संवेदना होनी चाहिए ताकि वह दूसरों के दुख को गहराई से महसूस कर सके।
कालिदास और कबीर में ये गुण थे। जो केवल हिसाब-किताब लगाता है या जो केवल भावुक होता है, वह महान कवि नहीं बन सकता।

आशय स्पष्ट कीजिए (Vyakhya)

(क) “दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है… हिलते-डुलते रहो…”
आशय: जीवन और मृत्यु (काल) का संघर्ष लगातार चलता रहता है। जो लोग एक ही जगह जड़ होकर बैठ जाते हैं (परिवर्तन का विरोध करते हैं), मृत्यु उन्हें जल्दी दबोच लेती है (कोड़े की मार)। लेकिन जो ‘हिलते-डुलते’ रहते हैं, यानी समय के साथ बदलते रहते हैं और गतिशील (Dynamic) रहते हैं, वे ही काल की मार से बच पाते हैं। जड़ता मृत्यु है और गतिशीलता जीवन है।
(ख) “जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका… वह भी क्या कवि है?”
आशय: सच्चा कवि वह है जो दुनियादारी, लाभ-हानि और ‘जोड़-तोड़’ (हिसाब-किताब) से ऊपर हो। उसे ‘फक्कड़’ (मस्तमौला) होना चाहिए। यदि वह चिंताओं और आसक्तियों में उलझा रहेगा, तो वह स्वतंत्र और महान साहित्य की रचना नहीं कर सकता।
(ग) “फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है।”
आशय: प्रकृति का हर तत्व (फूल/पेड़) केवल एक भौतिक वस्तु नहीं है, बल्कि वह एक संकेत या प्रतीक है। शिरीष का फूल केवल सुंदरता के लिए नहीं खिला है, बल्कि वह हमें संघर्ष, जिजीविषा और त्याग का संदेश देने वाला एक ‘इशारा’ है। वह हमें जीवन के उच्चतर मूल्यों की ओर देखने के लिए प्रेरित करता है।

शब्द-छवि (शब्दावली)

कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द अर्थ
अवधूत संन्यासी / सांसारिक बंधनों से मुक्त
जिजीविषा जीने की प्रबल इच्छा
कृषीवल किसान
तुंदिल तोंद वाला / मोटे पेट वाला
ईक्षुदंड गन्ने का तना (ईख)
अभ्रभेदी गगनचुंबी / आकाश को भेदने वाला
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