कवितावली / लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप
गोस्वामी तुलसीदास • आरोह भाग 2 (अध्याय 7)
युग-सत्य और भक्ति का समन्वय: तुलसीदास की दृष्टि
पाठ के साथ (प्रश्न-उत्तर)
1. ‘कवितावली’ के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है।
तुलसीदास केवल भक्त नहीं, बल्कि एक सजग समाज-सुधारक भी थे। ‘कवितावली’ में उन्होंने अपने युग की भयंकर गरीबी और बेरोजगारी का सजीव चित्रण किया है।
- वे लिखते हैं कि किसान के पास खेती नहीं है, भिखारी को भीख नहीं मिलती, और व्यापारी के पास व्यापार नहीं है।
- लोग ‘पेट की आग’ बुझाने के लिए धर्म-अधर्म सब कुछ करते हैं।
- माता-पिता विवश होकर अपनी संतानों को बेचने तक को तैयार हैं।
2. ‘पेट की आग का शमन ईश्वर (राम) भक्ति का मेघ ही कर सकता है’—क्या यह आज का भी युग-सत्य है?
तुलसीदास का मानना था कि पेट की आग (भूख) समुद्र की आग (बड़वानल) से भी भयंकर है, जिसे केवल राम-कृपा रूपी बादल (मेघ) ही बुझा सकता है।
आज का संदर्भ: यह पूर्णतः व्यावहारिक सत्य नहीं हो सकता, क्योंकि आज भूख मिटाने के लिए परिश्रम और रोजगार की आवश्यकता है। तथापि, आध्यात्मिक दृष्टि से यह सत्य है क्योंकि भक्ति मनुष्य को संतोष, धैर्य और नैतिक बल देती है, जिससे वह संकटों का सामना कर पाता है और गलत रास्तों पर नहीं भटकता।
आज का संदर्भ: यह पूर्णतः व्यावहारिक सत्य नहीं हो सकता, क्योंकि आज भूख मिटाने के लिए परिश्रम और रोजगार की आवश्यकता है। तथापि, आध्यात्मिक दृष्टि से यह सत्य है क्योंकि भक्ति मनुष्य को संतोष, धैर्य और नैतिक बल देती है, जिससे वह संकटों का सामना कर पाता है और गलत रास्तों पर नहीं भटकता।
3. तुलसी ने यह कहने की ज़रूरत क्यों समझी? “धूत कहौ, अवधूत कहौ…”
तुलसीदास के समय में जाति-पाति और पाखंड का बोलबाला था। समाज उनके राम-प्रेम और उदार विचारों पर कटाक्ष करता था।
इसके उत्तर में उन्होंने स्वाभिमान से कहा कि चाहे कोई उन्हें धूर्त कहे या योगी, राजपूत कहे या जुलाहा, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने “काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब” कहकर यह स्पष्ट कर दिया कि वे समाज की जाति-पाति की व्यवस्था से ऊपर हैं और उन्हें किसी से कोई संबंध नहीं जोड़ना है जिससे किसी की जाति बिगड़े।
इसके उत्तर में उन्होंने स्वाभिमान से कहा कि चाहे कोई उन्हें धूर्त कहे या योगी, राजपूत कहे या जुलाहा, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने “काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब” कहकर यह स्पष्ट कर दिया कि वे समाज की जाति-पाति की व्यवस्था से ऊपर हैं और उन्हें किसी से कोई संबंध नहीं जोड़ना है जिससे किसी की जाति बिगड़े।
4. “धूत कहौ…” वाले छंद में तुलसी की भीतरी असलियत एक स्वाभिमानी भक्त हृदय की है। क्या आप सहमत हैं?
हाँ, मैं इससे पूर्णतः सहमत हूँ।
ऊपर से तुलसीदास विनम्र दिखते हैं (माँगि कै खैबो…), लेकिन भीतर से वे अत्यंत स्वाभिमानी हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि वे केवल राम के गुलाम हैं। उन्हें दुनिया के राजा-महाराजाओं या समाज के ठेकेदारों की परवाह नहीं है। “लैबो को एकु न दैब को दोऊ” (न किसी से एक लेना, न दो देना) उनकी फक्कड़ और बेपरवाह तबीयत का परिचायक है।
ऊपर से तुलसीदास विनम्र दिखते हैं (माँगि कै खैबो…), लेकिन भीतर से वे अत्यंत स्वाभिमानी हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि वे केवल राम के गुलाम हैं। उन्हें दुनिया के राजा-महाराजाओं या समाज के ठेकेदारों की परवाह नहीं है। “लैबो को एकु न दैब को दोऊ” (न किसी से एक लेना, न दो देना) उनकी फक्कड़ और बेपरवाह तबीयत का परिचायक है।
व्याख्या (Explanation)
5(क). “मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।”
व्याख्या: यह राम का प्रलाप है। लक्ष्मण के मूर्छित होने पर राम विलाप करते हुए कहते हैं—”हे भाई! तुमने मेरे हित के लिए माता-पिता का त्याग कर दिया और जंगल में सर्दी (हिम), धूप (आतप) और तूफ़ान (बाता) सहे। तुम्हारे जैसा त्यागी भाई अब मुझे कहाँ मिलेगा?”
5(ख). “जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।”
व्याख्या: राम अपनी असहाय अवस्था का वर्णन करते हुए कहते हैं—”जैसे पंख के बिना पक्षी, मणि के बिना सांप (फनि) और सूंड (कर) के बिना श्रेष्ठ हाथी (करिबर) दीन-हीन हो जाते हैं, वैसे ही हे भाई! तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी व्यर्थ है (यदि दुर्भाग्य मुझे जीवित रखता है)।”
5(घ). “ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि, पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।”
व्याख्या: तुलसीदास कलयुग की भयावह स्थिति बताते हैं। लोग पेट भरने के लिए (पेट ही को पचत) अच्छे-बुरे कर्म करते हैं, धर्म-अधर्म का विचार छोड़ देते हैं। भूख की विवशता इतनी है कि लोग अपने बेटा-बेटी तक को बेचने (बेचत बेटा-बेटकी) के लिए मजबूर हैं।
पाठ के आस-पास (महत्वपूर्ण प्रश्न)
6. भ्रातृशोक में राम की दशा: प्रभु की नर लीला या सच्ची मानवीय अनुभूति?
कवि ने यहाँ राम को भगवान नहीं, बल्कि एक साधारण मनुष्य के रूप में दिखाया है।
राम का विलाप, धैर्य खोना, और यह कहना कि “मैं अवध जाकर क्या मुँह दिखाऊँगा” या “पत्नी के लिए भाई गंवा दिया”—यह सब एक सच्चे इंसान की पीड़ा है। यह ‘नर लीला’ से अधिक एक भाई के टूटे हुए हृदय की सच्ची पुकार (मानवीय अनुभूति) है जो पाठक को भी रुला देती है।
राम का विलाप, धैर्य खोना, और यह कहना कि “मैं अवध जाकर क्या मुँह दिखाऊँगा” या “पत्नी के लिए भाई गंवा दिया”—यह सब एक सच्चे इंसान की पीड़ा है। यह ‘नर लीला’ से अधिक एक भाई के टूटे हुए हृदय की सच्ची पुकार (मानवीय अनुभूति) है जो पाठक को भी रुला देती है।
7. शोकग्रस्त माहौल में हनुमान के अवतरण को ‘करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव’ क्यों कहा गया है?
जब राम रो रहे थे, तो वानर सेना शोक में डूबी थी (करुण रस)। तभी हनुमान जी संजीवनी बूटी का पर्वत लेकर आ गए।
हनुमान का आगमन, उनका पराक्रम और लक्ष्मण के जीवित होने की उम्मीद ने माहौल को एकदम बदल दिया। निराशा की जगह उत्साह और जोश छा गया। इसलिए इसे ‘करुण रस में वीर रस का प्रकट होना’ कहा गया है।
8. “ना रि हानि बिसेष छति नाहीं”—राम के इस कथन में स्त्री के प्रति कैसा सामाजिक दृष्टिकोण संभावित है?
राम शोक में कहते हैं कि “पत्नी की हानि कोई विशेष क्षति नहीं है, पर भाई को खोना अपूरणीय है।”
यह कथन तत्कालीन पितृसत्तात्मक समाज (Patriarchal Society) की सोच को दर्शाता है जहाँ भाई (पुरुष) का महत्व पत्नी (स्त्री) से अधिक माना जाता था। पत्नी को ‘बदला’ जा सकता था या उसका स्थान दूसरा था, लेकिन भाई को बाहुबल और वंश का रक्षक माना जाता था। हालाँकि, यह राम का प्रलाप भी है, जिसे अत्यधिक शोक की स्थिति में कहा गया है।
यह कथन तत्कालीन पितृसत्तात्मक समाज (Patriarchal Society) की सोच को दर्शाता है जहाँ भाई (पुरुष) का महत्व पत्नी (स्त्री) से अधिक माना जाता था। पत्नी को ‘बदला’ जा सकता था या उसका स्थान दूसरा था, लेकिन भाई को बाहुबल और वंश का रक्षक माना जाता था। हालाँकि, यह राम का प्रलाप भी है, जिसे अत्यधिक शोक की स्थिति में कहा गया है।
इन्हें भी जानें (छंद परिचय)
काव्य-रूप और छंद:
- चौपाई: 16-16 मात्राओं वाला सम मात्रिक छंद।
- दोहा: 13-11 मात्राओं वाला अर्द्धसम मात्रिक छंद।
- सोरठा: दोहे का उल्टा (11-13 मात्राएँ)।
- कवित्त (मनहरण): वार्णिक छंद (31 वर्ण)। ‘किसबी, किसान…’ कवित्त है।
- सवैया (मत्तगयंद): वार्णिक छंद (22-26 वर्ण)। ‘धूत कहौ…’ सवैया है।