रुबाइयाँ / गज़ल
फ़िराक़ गोरखपुरी • आरोह भाग 2 (अध्याय 8)
वात्सल्य रस और रक्षाबंधन के पवित्र बंधन का चित्रण
पाठ के साथ (प्रश्न-उत्तर)
1. शायर राखी के लच्छे को बिजली की चमक की तरह कहकर क्या भाव व्यंजित करना चाहता है?
शायर ने राखी के लच्छों (धागों) की तुलना बिजली की चमक से की है।
भाव: जिस प्रकार सावन के काले बादलों (घटाओं) के बीच बिजली चमकती है, उसी प्रकार रक्षाबंधन के दिन भाई-बहन का पवित्र प्रेम चमक उठता है। राखी के रंग-बिरंगे और चमकीले धागे भाई-बहन के रिश्ते की पवित्रता, उल्लास और अटूट बंधन के प्रतीक हैं। यह संबंध बिजली की तरह ही तेजस्वी और प्रकाशवान है।
भाव: जिस प्रकार सावन के काले बादलों (घटाओं) के बीच बिजली चमकती है, उसी प्रकार रक्षाबंधन के दिन भाई-बहन का पवित्र प्रेम चमक उठता है। राखी के रंग-बिरंगे और चमकीले धागे भाई-बहन के रिश्ते की पवित्रता, उल्लास और अटूट बंधन के प्रतीक हैं। यह संबंध बिजली की तरह ही तेजस्वी और प्रकाशवान है।
2. ‘खुद का परदा खोलने’ से क्या आशय है?
गज़ल में शायर कहता है कि जो लोग उसकी निंदा (बुराई) करते हैं, वे दरअसल शायर का नहीं, बल्कि अपना ही पर्दा खोल रहे हैं (अपना भेद खोल रहे हैं)।
आशय: निंदा करने से आलोचक की अपनी संकीर्ण मानसिकता, जलन और छोटेपन का पता चलता है। शायर को बदनाम करने की कोशिश में वे अपना ही चरित्र और असलियत दुनिया के सामने ला देते हैं।
आशय: निंदा करने से आलोचक की अपनी संकीर्ण मानसिकता, जलन और छोटेपन का पता चलता है। शायर को बदनाम करने की कोशिश में वे अपना ही चरित्र और असलियत दुनिया के सामने ला देते हैं।
टिप्पणी करें (Notes)
(क) गोदी के चाँद और गगन के चाँद का रिश्ता।
माँ की गोद में बैठा उसका बच्चा ‘गोदी का चाँद’ है, जो आकाश में चमकते ‘गगन के चाँद’ को खिलौना समझकर मांग रहा है।
यहाँ दोनों चाँदों के बीच एक अद्भुत रिश्ता है—एक (बच्चा) धरती पर माँ की गोद की शोभा बढ़ा रहा है और दूसरा (चंद्रमा) आकाश की। बच्चा अपनी जिद्द से धरती और आकाश को एक कर देता है। यह वात्सल्य रस का सुंदर उदाहरण है।
यहाँ दोनों चाँदों के बीच एक अद्भुत रिश्ता है—एक (बच्चा) धरती पर माँ की गोद की शोभा बढ़ा रहा है और दूसरा (चंद्रमा) आकाश की। बच्चा अपनी जिद्द से धरती और आकाश को एक कर देता है। यह वात्सल्य रस का सुंदर उदाहरण है।
(ख) सावन की घटाएँ व रक्षाबंधन का पर्व।
रक्षाबंधन का त्यौहार सावन के महीने में आता है।
कविता में सावन की हल्की-हल्की घटाओं (बादलों) और राखी के चमकीले लच्छों का सुंदर संयोग दिखाया गया है। आकाश में बादलों की घटाएँ छाई हैं और धरती पर भाई की कलाई में राखी की चमक बिजली जैसी है। यह मौसम और त्यौहार के उल्लास का मणिकांचन संयोग है।
कविता में सावन की हल्की-हल्की घटाओं (बादलों) और राखी के चमकीले लच्छों का सुंदर संयोग दिखाया गया है। आकाश में बादलों की घटाएँ छाई हैं और धरती पर भाई की कलाई में राखी की चमक बिजली जैसी है। यह मौसम और त्यौहार के उल्लास का मणिकांचन संयोग है।
कविता के आस-पास (तुलनात्मक अध्ययन)
1. रुबाइयों में हिंदी, उर्दू और लोकभाषा के मिले-जुले प्रयोग को छांटिए।
फ़िराक़ गोरखपुरी की भाषा में गंगा-जमुनी तहजीब (हिंदी-उर्दू संगम) झलकती है।
- उर्दू शब्द: फ़ितरत, तवाज़ुन, गर्दूं, बाबे-सुख़न।
- हिंदी शब्द: रूपवती, बिजली, घटा, दीपक।
- लोकभाषा (देशज): लोका देना (उछालना), घुटुनियों में (घुटनों के बल), पुतली, लच्छे।
2. (आपसी-दारी) दी गई पंक्तियों का फ़िराक़ की रुबाई/गज़ल से मिलान करें।
| अन्य कवि की पंक्ति | फ़िराक़ की समानार्थी पंक्ति (भाव) |
|---|---|
| (क) सूरदास: मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों। | रुबाई: “आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी… / कहती है कि यह चाँद है (आया) है उतर।” |
| (ख) पंत: वियोगी होगा पहला कवि / आह से उपजा होगा गान। | गज़ल: “तुमने हमको बदनाम किया, / …ये ऐसे शेर (काव्य) हुए।” (दर्द से शायरी का जन्म)। |
| (ग) कबीर: सीस उतारे भुइँ धरे तब मिलिहैं करतार। | गज़ल: “ये कीमत भी अदा करें हैं हम… / …जान फिदा (कुर्बान) करती है।” (प्रेम में सर्वस्व न्योछावर)। |