छोटा मेरा खेत / बगुलों के पंख
उमाशंकर जोशी • आरोह भाग 2 (अध्याय 9)
रूपक: कागज़ का पन्ना ही कवि का खेत है और शब्द उसके बीज
कविता के साथ (प्रश्न-उत्तर)
1. छोटे चौकोने खेत को कागज़ का पन्ना कहने में क्या अर्थ निहित है?
कवि ने ‘खेती’ (कृषिकर्म) और ‘कविता’ (कविकर्म) की तुलना की है।
जैसे किसान चौकोने खेत में बीज बोता है, वैसे ही कवि चौकोने कागज़ पर विचारों के बीज बोता है। कागज़ का पन्ना ही कवि का कर्मक्षेत्र है जहाँ वह अपनी भावनाओं को शब्दों के माध्यम से उगाता है। यह तुलना रचना-प्रक्रिया को समझाने के लिए की गई है।
जैसे किसान चौकोने खेत में बीज बोता है, वैसे ही कवि चौकोने कागज़ पर विचारों के बीज बोता है। कागज़ का पन्ना ही कवि का कर्मक्षेत्र है जहाँ वह अपनी भावनाओं को शब्दों के माध्यम से उगाता है। यह तुलना रचना-प्रक्रिया को समझाने के लिए की गई है।
2. रचना के संदर्भ में ‘अंधड़’ और ‘बीज’ क्या हैं?
- अंधड़: यह भावनात्मक आवेग (Emotional Storm) या तीव्र प्रेरणा है। जब मन में भावनाओं का तूफ़ान उठता है, तभी सृजन की प्रक्रिया शुरू होती है।
- बीज: यह विचार (Idea) या विषय-वस्तु है। जैसे बीज गलकर पौधा बनता है, वैसे ही कवि का विचार शब्दों में ढलकर और अहं (Ego) को गलाकर कविता का रूप लेता है।
3. ‘रस का अक्षयपात्र’ से कवि ने रचनाकर्म की किन विशेषताओं की ओर इंगित किया है?
अक्षयपात्र वह बर्तन है जो कभी खाली नहीं होता। कवि ने साहित्य (कविता) को ‘रस का अक्षयपात्र’ कहा है क्योंकि:
खेत में उगा अनाज कटने के बाद खत्म हो जाता है, लेकिन कविता का रस (आनंद) अनंत काल तक बना रहता है। इसे जितना पढ़ा जाए, इसका आनंद उतना ही बढ़ता है। यह शाश्वत और कालजयी होती है।
खेत में उगा अनाज कटने के बाद खत्म हो जाता है, लेकिन कविता का रस (आनंद) अनंत काल तक बना रहता है। इसे जितना पढ़ा जाए, इसका आनंद उतना ही बढ़ता है। यह शाश्वत और कालजयी होती है।
व्याख्या (Explanation)
4(1). “शब्द के अंकुर फूटे, पल्लव-पुष्पों से नमित हुआ विशेष।”
व्याख्या: कवि कहता है कि जब कागज़ रूपी खेत में विचार रूपी बीज बोया जाता है और कल्पना का जल मिलता है, तो शब्द रूपी अंकुर फूटते हैं। धीरे-धीरे यह रचना भावों और अलंकारों के पत्तों और फूलों (पल्लव-पुष्पों) से लद जाती है और एक संपूर्ण कविता के रूप में झुक जाती है (विनम्र होकर पाठकों को समर्पित हो जाती है)।
4(2). “रोपाई क्षण की, कटाई अनंतता की, लुटते रहने से ज़रा भी नहीं कम होती।”
व्याख्या: कविता लिखने का क्षण (रोपाई) तो छोटा होता है, कोई विचार एक पल में आता है। लेकिन उससे जो कृति तैयार होती है, उसका आनंद (कटाई) अनंत काल तक लिया जाता है। साहित्य का खजाना ऐसा है जिसे जितना लुटाया (पढ़ा) जाए, वह कम नहीं होता बल्कि और बढ़ता है।
कविता के आस-पास (बिंब और रूपक)
1. बिंब (Imagery) की खोज करें (दृश्य, चित्र, ध्वनि)।
कवि ने शब्दों के माध्यम से सजीव चित्र उकेरे हैं:
- दृश्य बिंब: छोटा चौकोना खेत, नभ में पाती बाँधे बगुलों के पंख, तैरती साँझ की श्वेत काया।
- क्रियात्मक बिंब: बीज का गलना, अंकुर का फूटना, पंखों का फैलना।
2. रूपक (Metaphor) का चुनाव करें।
इस कविता में ‘सांगरूपक अलंकार’ (Extended Metaphor) है।
| उपमेय (कविता) | उपमान (खेती) |
|---|---|
| कागज़ का पन्ना | चौकोना खेत |
| विचार/भाव | बीज |
| शब्द | अंकुर |
| का्यानंद (साहित्यिक रस) | अक्षयपात्र |
कला की बात (बगुलों के पंख)
सौंदर्य: कजरारे बादलों पर तैरती सांझ की श्वेत काया
• ‘बगुलों के पंख’ कविता पढ़ने पर आपके मन में कैसे चित्र उभरते हैं?
कविता पढ़ने पर मन में एक अत्यंत मनमोहक दृश्य उभरता है:
शाम का समय है, आकाश में काले-काले बादल छाए हुए हैं। उनके बीच सफ़ेद बगुलों की कतार (पाती) पंख फैलाकर उड़ रही है। यह दृश्य ऐसा लगता है मानो साँझ (संध्या) की सफ़ेद काया आकाश में तैर रही हो। यह सौंदर्य इतना आकर्षक है कि वह मन को अपनी ओर खींच लेता है और नज़रें हटना नहीं चाहतीं।
शाम का समय है, आकाश में काले-काले बादल छाए हुए हैं। उनके बीच सफ़ेद बगुलों की कतार (पाती) पंख फैलाकर उड़ रही है। यह दृश्य ऐसा लगता है मानो साँझ (संध्या) की सफ़ेद काया आकाश में तैर रही हो। यह सौंदर्य इतना आकर्षक है कि वह मन को अपनी ओर खींच लेता है और नज़रें हटना नहीं चाहतीं।