जूझ

आनंद यादव • वितान भाग 2 (अध्याय 2)

खेत की मिट्टी से कविता के पन्नों तक का संघर्षमय सफर

पाठ के साथ (प्रश्न-उत्तर)

1. ‘जूझ’ शीर्षक के औचित्य पर विचार करते हुए यह स्पष्ट करें कि क्या यह शीर्षक कथा नायक की किसी केंद्रीय चारित्रिक विशेषता को उजागर करता है?
‘जूझ’ का अर्थ है—संघर्ष करना (Struggle)
यह शीर्षक पूरी तरह उचित है क्योंकि यह कथा नायक (आनंद/जकाते) के जीवन के हर पहलू में संघर्ष को दर्शाता है:
  • शिक्षा के लिए संघर्ष: पिता के विरोध के बावजूद स्कूल जाने के लिए लड़ना।
  • काम का संघर्ष: खेत में कोल्हू चलाने से लेकर ढोर चराने तक का कठिन परिश्रम।
  • साहित्यिक संघर्ष: तुकबंदी करने और कविता रचने के लिए शब्दों से जूझना।
यह नायक की ‘जुझारू प्रवृत्ति’ (Fighting Spirit) और हार न मानने की विशेषता को उजागर करता है।
2. स्वयं कविता रच लेने का आत्मविश्वास लेखक के मन में कैसे पैदा हुआ?
लेखक के मन में आत्मविश्वास जगाने में उनके मराठी शिक्षक श्री सौंदलगेकर का बड़ा हाथ था।
  • लेखक ने देखा कि उनके शिक्षक स्वयं कविताएँ लिखते हैं और कवियों के बारे में बातें करते हैं।
  • इससे लेखक को महसूस हुआ कि “कवि भी हाड़-मांस का बना हमारी तरह ही एक मनुष्य होता है।”
  • जब उन्होंने खेत में काम करते समय तुकों को मिलाना शुरू किया और शिक्षक ने उनकी प्रशंसा की, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया।
3. श्री सौंदलगेकर के अध्यापन की उन विशेषताओं को रेखांकित करें जिन्होंने कविताओं के प्रति लेखक के मन में रुचि जगाई।
श्री सौंदलगेकर एक अद्भुत अध्यापक थे:
  1. सस्वर पाठ: वे कविता गाकर, अभिनय के साथ और भाव विभोर होकर सुनाते थे।
  2. छंद-लय का ज्ञान: वे छात्रों को छंद, लय और गति की बारीकियां समझाते थे।
  3. आत्मीयता: वे लेखक को ‘अपनापन’ देते थे, उसे अपनी लिखी कविताएं दिखाते थे और प्रोत्साहित करते थे।
  4. प्रेरणा: वे लेखक को अन्य कवियों के काव्य-संग्रह और पुस्तकें पढ़ने के लिए देते थे।
4. कविता के प्रति लगाव से पहले और उसके बाद अकेलेपन के प्रति लेखक की धारणा में क्या बदलाव आया?
पहले: खेत में काम करते समय लेखक को अकेलापन खलता था। उसे लगता था कि कोई साथ बात करने वाला होना चाहिए।
बाद में (कविता के साथ): कविता से लगाव होने के बाद उसे अकेलापन अच्छा लगने लगा। अब वह चाहता था कि वह अकेला रहे ताकि वह ज़ोर-ज़ोर से कविता गा सके, अभिनय कर सके और थुई-थुई करके नाच सके। अकेलेपन में उसे अपनी आवाज और कविता की लय का सही आनंद मिलने लगा।
5. आपके खयाल से पढ़ाई-लिखाई के संबंध में लेखक और दत्ता जी राव का रवैया सही था या लेखक के पिता का? तर्क सहित उत्तर दें।
निस्संदेह, लेखक और दत्ता जी राव का रवैया सही था।

तर्क:
  • पिता का रवैया स्वार्थी था। वे बेटे को केवल ‘खेत का मजदूर’ बनाना चाहते थे ताकि वे खुद मज़े कर सकें।
  • लेखक और दत्ता जी राव जानते थे कि खेती में अब ज्यादा लाभ नहीं है। शिक्षा से न केवल नौकरी मिल सकती है, बल्कि व्यक्ति का मानसिक विकास होता है और वह जीवन में कुछ बेहतर कर सकता है (जैसे लेखक बाद में एक सफल साहित्यकार बना)।

घटनाक्रम और अनुमान

6. दत्ता जी राव से पिता पर दबाव डलवाने के लिए लेखक और उसकी माँ को एक झूठ का सहारा लेना पड़ा। यदि झूठ का सहारा न लेना पड़ता तो आगे का घटनाक्रम क्या होता?
यदि लेखक और उसकी माँ ने झूठ का सहारा नहीं लिया होता (कि “राव साहब ने बुलाया है”), तो:
  1. पिता कभी दत्ता जी राव के पास नहीं जाते।
  2. दत्ता जी राव को लेखक की पढ़ाई छूटने की बात पता ही नहीं चलती और वे पिता को नहीं डांटते।
  3. पिता की मनमानी चलती रहती और लेखक का जीवन खेती-बाड़ी और कोल्हू के बैल की तरह ही बीत जाता।
  4. हमें ‘जूझ’ जैसा प्रेरणादायक उपन्यास और आनंद यादव जैसा साहित्यकार नहीं मिलता।
कभी-कभी एक बड़ा और सकारात्मक उद्देश्य हासिल करने के लिए बोला गया झूठ भी ‘नीति-सम्मत’ होता है।
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