अतीत में दबे पाँव
ओम थानवी • वितान भाग 2 (अध्याय 3)
सिंधु घाटी सभ्यता: नियोजित नगर, जल-संस्कृति और मौन इतिहास
पाठ के साथ (प्रश्न-उत्तर)
1. सिंधु-सभ्यता साधन-संपन्न थी, पर उसमें भव्यता का आडंबर नहीं था। कैसे?
सिंधु-सभ्यता साधन-संपन्न थी क्योंकि वहाँ सुनियोजित नगर, पक्की ईंटों के मकान, उन्नत खेती, व्यापार और पानी की उत्तम व्यवस्था थी।
आडंबरहीनता (Simplicity):
आडंबरहीनता (Simplicity):
- वहाँ अन्य सभ्यताओं की तरह बड़े-बड़े महल, विशाल मंदिर या राजाओं की समाधियाँ (पिरामिड) नहीं मिलीं।
- राजा का मुकुट भी बहुत छोटा था और नावें भी छोटे आकार की थीं।
- वहाँ की भव्यता ‘दिखावे’ में नहीं, बल्कि ‘उपयोगिता’ (Utility) और ‘व्यवस्था’ में थी।
2. ‘सिंधु-सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।’ ऐसा क्यों कहा गया?
अधिकतर प्राचीन सभ्यताओं में कला और निर्माण राजा या धर्म के प्रभाव में होते थे (बड़ी मूर्तियां, मंदिर)।
लेकिन सिंधु घाटी में:
लेकिन सिंधु घाटी में:
- वहाँ का सौंदर्य आम आदमी के जीवन से जुड़ा था।
- खिलौने, मृदभांड (मिट्टी के बर्तन), आभूषण, सुघड़ लिपि और नगर-नियोजन—सब में एक कलात्मकता थी।
- यह सौंदर्य किसी राजा के आदेश से नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक रुचि से उपजा था।
3. पुरातत्व के किन चिह्नों के आधार पर आप कह सकते हैं कि सिंधु-सभ्यता ताकत से शासित होने की अपेक्षा समझ से अनुशासित सभ्यता थी?
अनुशासन के प्रमाण:
1. हथियारों का अभाव: खुदाई में कोई विनाशक हथियार या बड़ी सेना के सबूत नहीं मिले।
2. एकरूपता: पूरे शहर में ईंटों का आकार, गलियों की चौड़ाई और पानी की निकासी व्यवस्था एक जैसी थी।
3. निष्कर्ष: यह अनुशासन किसी राजा के डंडे (ताकत) के जोर पर नहीं, बल्कि नागरिकों की अपनी ‘समझ’ और ‘नागरिक बोध’ (Civic Sense) से स्थापित था।
2. एकरूपता: पूरे शहर में ईंटों का आकार, गलियों की चौड़ाई और पानी की निकासी व्यवस्था एक जैसी थी।
3. निष्कर्ष: यह अनुशासन किसी राजा के डंडे (ताकत) के जोर पर नहीं, बल्कि नागरिकों की अपनी ‘समझ’ और ‘नागरिक बोध’ (Civic Sense) से स्थापित था।
4. “टूटी-फूटी सीढ़ियाँ… आकाश की तरफ अधूरी रह जाती हैं… आप इतिहास के पार झाँक रहे हैं।” इस कथन का आशय क्या है?
यह एक दार्शनिक कथन है।
मुअनजो-दड़ो के खंडहरों की सीढ़ियाँ अब कहीं नहीं जातीं (छत/मंजिलें गिर चुकी हैं), वे आकाश में खत्म हो जाती हैं। लेकिन उन पर खड़े होकर हम केवल टूटे पत्थरों को नहीं देखते, बल्कि समय (इतिहास) के पार उन लोगों के जीवन को महसूस करते हैं जो कभी वहाँ रहते थे। हम उस सभ्यता की धड़कन को सुन पाते हैं।
मुअनजो-दड़ो के खंडहरों की सीढ़ियाँ अब कहीं नहीं जातीं (छत/मंजिलें गिर चुकी हैं), वे आकाश में खत्म हो जाती हैं। लेकिन उन पर खड़े होकर हम केवल टूटे पत्थरों को नहीं देखते, बल्कि समय (इतिहास) के पार उन लोगों के जीवन को महसूस करते हैं जो कभी वहाँ रहते थे। हम उस सभ्यता की धड़कन को सुन पाते हैं।
5. टूटे-फूटे खंडहर, सभ्यता और संस्कृति के इतिहास के साथ-साथ धड़कती ज़िंदगियों के अनछुए समयों का भी दस्तावेज़ होते हैं—भाव स्पष्ट कीजिए।
खंडहर केवल ईंट-पत्थर नहीं होते, वे जीवंत दस्तावेज होते हैं।
जब हम मुअनजो-दड़ो की गलियों, रसोइयों या चौबारों को देखते हैं, तो हमें वहां के लोगों की हंसी, बैलगाड़ियों की आवाजें और पक्ते खाने की महक महसूस होती है। ये खंडहर हमें उन ‘अनछुए पलों’ से जोड़ते हैं जो इतिहास की किताबों में दर्ज नहीं होते, पर कभी जिए गए थे।
जब हम मुअनजो-दड़ो की गलियों, रसोइयों या चौबारों को देखते हैं, तो हमें वहां के लोगों की हंसी, बैलगाड़ियों की आवाजें और पक्ते खाने की महक महसूस होती है। ये खंडहर हमें उन ‘अनछुए पलों’ से जोड़ते हैं जो इतिहास की किताबों में दर्ज नहीं होते, पर कभी जिए गए थे।
पाठ के आस-पास (विचार और कल्पना)
6. किसी ऐसे ऐतिहासिक स्थल का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए जिसे आपने नज़दीक से देखा हो।
(यह प्रश्न विद्यार्थी के निजी अनुभव पर आधारित है। उदाहरण के लिए:)
लाल किला (दिल्ली): “मैंने दिल्ली के लाल किले को नज़दीक से देखा है। लाल बलुआ पत्थर से बनी इसकी विशाल दीवारें मुग़ल वास्तुकला की भव्यता को दर्शाती हैं। दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास को देखकर उस समय के दरबार की कल्पना की जा सकती है। हालाँकि अब वहाँ राजा नहीं हैं, पर किले का हर कोना इतिहास की गवाही देता है। वहाँ की नक्काशी और नहर-ए-बहिश्त (नहर) आज भी उस समय के सौंदर्य-बोध को जीवित रखते हैं।”
लाल किला (दिल्ली): “मैंने दिल्ली के लाल किले को नज़दीक से देखा है। लाल बलुआ पत्थर से बनी इसकी विशाल दीवारें मुग़ल वास्तुकला की भव्यता को दर्शाती हैं। दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास को देखकर उस समय के दरबार की कल्पना की जा सकती है। हालाँकि अब वहाँ राजा नहीं हैं, पर किले का हर कोना इतिहास की गवाही देता है। वहाँ की नक्काशी और नहर-ए-बहिश्त (नहर) आज भी उस समय के सौंदर्य-बोध को जीवित रखते हैं।”
7. क्या हम सिंधु घाटी सभ्यता को ‘जल-संस्कृति’ (Water Culture) कह सकते हैं? तर्क दें।
हाँ, पूर्णतः सहमत। लेखक के पक्ष में तर्क:
- महाकुंड (Great Bath): 40 फीट लंबा और 25 फीट चौड़ा पक्का तालाब, जो शायद धार्मिक स्नान के लिए था।
- कुएँ: केवल मुअनजो-दड़ो में ही लगभग 700 कुएँ मिले हैं। इसे ‘कुओं का शहर’ भी कहा जा सकता है।
- निकासी व्यवस्था (Drainage): ढकी हुई पक्की नालियाँ, जो आज के शहरों से भी बेहतर थीं।
- नदी (सिंधु) के किनारे बसा होना।
8. सिंधु सभ्यता का कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिला (अनपढ़ लिपि)। क्या इससे आपके मन में कोई भिन्न धारणा बनती है?
सिंधु लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।
इससे यह धारणा बनती है कि उस सभ्यता में अभी भी ‘रहस्य’ बाकी हैं। हम केवल अनुमान लगा रहे हैं। हो सकता है अगर लिपि पढ़ ली जाए, तो हमें पता चले कि उनकी शासन व्यवस्था या धर्म हमारे अनुमान से बिल्कुल अलग था। यह ‘मौन’ उस सभ्यता को और अधिक रहस्यमयी और आकर्षक बनाता है।
इससे यह धारणा बनती है कि उस सभ्यता में अभी भी ‘रहस्य’ बाकी हैं। हम केवल अनुमान लगा रहे हैं। हो सकता है अगर लिपि पढ़ ली जाए, तो हमें पता चले कि उनकी शासन व्यवस्था या धर्म हमारे अनुमान से बिल्कुल अलग था। यह ‘मौन’ उस सभ्यता को और अधिक रहस्यमयी और आकर्षक बनाता है।